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मुठ्ठी भर ज़मीन में || Kisan shayari || farmer hindi shayari
मुठ्ठी भर ज़मीं में अपनी भुख़ बो रहा हूं,
मिट्टी तन पर लगी थी पर कमीज़ धों रहा हूं,
रो रहा हूं के बारिश की बूंदे बहुत कम थी, पर
कहूंगा नहीं भूखे पेट ना जाने कबसे सो रहा हूं...
Title: मुठ्ठी भर ज़मीन में || Kisan shayari || farmer hindi shayari
Zindagi hai ki samajdaar bnaye ja rahi hai
तमन्ना है नासमझ रहकर जीने की ज़िंदगी है कि समझदार बनाए जा रही है 

