मुर्शिद आज चराग़-ए-ग़म जलाऊँगा मैं
आज रात भर रात का दिल दुखाऊँगा मैं
आज किताब-ए-मुहब्बत के साथ साथ
तेरी निशानियों को भी आग लगाऊँगा मैं
ऐ सितमगर एहतियात-ए-हिजाब करना
अब फ़क़त तुझपे ही क़लम उठाऊँगा मैं
मुर्शिद आज चराग़-ए-ग़म जलाऊँगा मैं
आज रात भर रात का दिल दुखाऊँगा मैं
आज किताब-ए-मुहब्बत के साथ साथ
तेरी निशानियों को भी आग लगाऊँगा मैं
ऐ सितमगर एहतियात-ए-हिजाब करना
अब फ़क़त तुझपे ही क़लम उठाऊँगा मैं
Jad yaad kita me beete samee nu
taan ik chehra akhaan sahmne aayea
chehra jo bahut hi khaas c
meri shayari de lafzaan di pyaas c
ਜਦ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਮੈਂ ਬੀਤੇ ਸਮੇਂ ਨੂੰ
ਤਾਂ ਇਕ ਚਹਿਰਾ ਅੱਖਾਂ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ
ਚਹਿਰਾ ਜੋ ਬਹੁਤ ਹੀ ਖਾਸ ਸੀ
ਮੇਰੀ ਸ਼ਾਇਰੀ ਦੇ ਲਫਜ਼ਾਂ ਦੀ ਪਿਆਸ ਸੀ
teri muhabbat bhee kiraaye ke ghar kee tarah thi,
kitna bhi sajaaya par meri nahin huee……
तेरी मुहब्बत भी किराये के घर की तरह थी,
कितना भी सजाया पर मेरी नहीं हुई……