मुर्शिद आज चराग़-ए-ग़म जलाऊँगा मैं
आज रात भर रात का दिल दुखाऊँगा मैं
आज किताब-ए-मुहब्बत के साथ साथ
तेरी निशानियों को भी आग लगाऊँगा मैं
ऐ सितमगर एहतियात-ए-हिजाब करना
अब फ़क़त तुझपे ही क़लम उठाऊँगा मैं
मुर्शिद आज चराग़-ए-ग़म जलाऊँगा मैं
आज रात भर रात का दिल दुखाऊँगा मैं
आज किताब-ए-मुहब्बत के साथ साथ
तेरी निशानियों को भी आग लगाऊँगा मैं
ऐ सितमगर एहतियात-ए-हिजाब करना
अब फ़क़त तुझपे ही क़लम उठाऊँगा मैं
चुप रह कर, ये क़माल देखने लगा
उस शिकारी का,ज़ाल देखने लगा
उसने कहा, देखो आ गया समंदर
और मैं अपना, रुमाल देखने लगा
पहले उसने मेरा सर रखा,कंधे पर
फिर वो भीगे हुए,गाल देखने लगा
इसको नया इश्क़,मंज़ूर ही कहां है
दिल फिर पुराना,साल देखने लगा
याद आ गए,फिर उसके गाल मुझे
मैं होली में जब,गुलाल देखने लगा
और जब निवाला देकर,ली फोटो
मुस्कुरा के मैं, हड़ताल देखने लगा
मोहब्बत नही तो मोहब्बत को इंकार करो,
मैंने कब कहा की तुम भी मुझ पर ऐतबार करो,
खुदा की कसम नही देखेंगे तुम्हे कभी पलट कर जिंदगी भर,
मैंने कब कहा की तुम पीछे से मुझ पर वार करो