बारी – बारी सब चले गए,
पर तुम हाथ थामें रखना।
मेरी जो कुछ भी बची है वो,
उम्मीदों को संभाल कर रखना।
माना थोड़ी जिद्दी हूं मैं,
तुम मेरी जिद्द को पूरा करना।
बारी – बारी सब चले गए,
पर तुम हाथ थामें रखना।
बारी – बारी सब चले गए,
पर तुम हाथ थामें रखना।
मेरी जो कुछ भी बची है वो,
उम्मीदों को संभाल कर रखना।
माना थोड़ी जिद्दी हूं मैं,
तुम मेरी जिद्द को पूरा करना।
बारी – बारी सब चले गए,
पर तुम हाथ थामें रखना।
Manzil ka naraaz hona bhi zayaz tha..
ham bhi toh ajjnabi raahon se dil lagaa baithe the..
मंजिल का नाराज होना भी जायज था…
हम भी तो अजनबी राहों से दिल लगा बैठे थे…
उनके चेहरे की हंसी पर नजर मेरी तब पड़ी, जब शहर में मेरा आना हुआ..
अब उनके चेहरे पर ही रहती है ये हर घड़ी, और उनका मुझे देख शर्माना हुआ..
मेरी नज़रों पे उनकी नज़रों ने लगाई ऐसी हथ-कडी, ना फिर मेरा कभी घर जाना हुआ..
अब नज़रों से सिर्फ वही देखते हैं, जो वो दिखाती है, ना जाने भरा ये हमने, कैसा हर-ज़ाना हुआ..