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CHOOR

Dil saade ne kita ae saanu majboor bada teriyaan yaadan vich ro ro k apne aap nu hi kitaa choor choor bada

Dil saade ne kita ae saanu majboor bada
teriyaan yaadan vich ro ro k
apne aap nu hi kitaa choor choor bada


Best Punjabi - Hindi Love Poems, Sad Poems, Shayari and English Status


Mohobbat bhut e tere naal || sacha pyar shayari || Punjabi poetry

Kinni vi koshish kar lawa mein
Tera Nata na tutte dil mere naal
Mohobbat bhut e tere naal..!!

Akhan ch khuab te supne sajje
Sajjna tere chehre naal
Mohobbat bhut e tere naal..!!

Manzil bana tenu raah rushnaune ne
Todne naate hanere naal
Mohobbat bhut e tere naal..!!

Rabb kolo mang ho Jana tere
Lai ke lawan phere naal
Mohobbat bhut e tere naal..!!

ਕਿੰਨੀ ਵੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਲਵਾਂ ਮੈਂ
ਤੇਰਾ ਨਾਤਾ ਨਾ ਟੁੱਟੇ ਦਿਲ ਮੇਰੇ ਨਾਲ
ਮੋਹੁੱਬਤ ਬਹੁਤ ਏ ਤੇਰੇ ਨਾਲ..!!

ਅੱਖਾਂ ‘ਚ ਖ਼ੁਆਬ ਤੇ ਸੁਪਨੇ ਸੱਜੇ
ਸੱਜਣਾ ਤੇਰੇ ਚਿਹਰੇ ਨਾਲ
ਮੋਹੁੱਬਤ ਬਹੁਤ ਏ ਤੇਰੇ ਨਾਲ..!!

ਮੰਜ਼ਿਲ ਬਣਾ ਤੈਨੂੰ ਰਾਹ ਰੁਸ਼ਨਾਉਣੇ ਨੇ
ਤੋੜਨੇ ਨਾਤੇ ਹਨੇਰੇ ਨਾਲ
ਮੋਹੁੱਬਤ ਬਹੁਤ ਏ ਤੇਰੇ ਨਾਲ..!!

ਰੱਬ ਕੋਲੋਂ ਮੰਗ ਹੋ ਜਾਣਾ ਤੇਰੇ
ਲੈ ਕੇ ਲਾਵਾਂ ਫ਼ੇਰੇ ਨਾਲ
ਮੋਹੁੱਬਤ ਬਹੁਤ ਏ ਤੇਰੇ ਨਾਲ..!!

Title: Mohobbat bhut e tere naal || sacha pyar shayari || Punjabi poetry


Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry

थी मै,शांत चित्त बहती नदी – सी
तलहटी में था कुछ जमा हुआ
कुछ बर्फ – सा ,कुछ पत्थर – सा।
शायद कुछ मरा हुआ..
कुछ अधमरा सा।
छोड़ दिया था मैंने
हर आशा व निराशा।
होंठो में मुस्कान लिए
जीवन के जंग में उलझी
कभी सुलगी,कभी सुलझी..
बस बहना सीख लिया था मैंने।
जो लगी थी चोट कभी
जो टूटा था हृदय कभी
उन दरारों को सबसे छुपा लिया था
कर्तव्यों की आड़ में।
फिर एक दिन..
हवा के झोंके के संग
ना जाने कहीं से आया
एक मनभावन चंचल तितली
था वो जरा प्यासा सा
मनमोहक प्यारा सा।
खुशबूओं और पुष्पों
की दुनिया छोड़
सारी असमानताओं और
बंधनों को तोड़
सहमी – बहती नदी को
खुलकर बहना सीखा गया,
अपने प्रेम की गरमी से
बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया।
पाकर विश्वास कोमल भावों से जोड़े नाते का
सारी दबी अपेक्षाएं हो गई फिर जीवंत
लेकिन क्या पता था –
होगा इसका भी एक दिन अंत !
तितली को आयी अपनों की याद
मुड़ चला बगिया की ओर
सह ना सकी ये देख नदी
ये बिछड़न ये एकाकीपन
रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें
दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी
सिसक सिसक कर उसे बतलाई।
नहीं सुनना था उसे,
नहीं सुन पाया वो।
नहीं रुकना था उसे,
नहीं रुक पाया वो।
तेज उफान आया नदी में,
क्रोध और अवसाद
छाया मन में,
फिर छला था
नेह जता कर किसी ने।
आवाज देती..लहरें,
उठती और गिरती
किनारों से टकराती,
हो गई घायल।
बीत गए असंख्य क्षण
उसकी वापसी की आस में
लेकिन सामने था, तो सिर्फ शून्य।
हो गई नदी फिर से मौन..
छा गई निरवता।
लेकिन अबकी बार,
नहीं जमा कुछ तलहटी में
कुछ बर्फ सा,
कुछ पत्थर सा।
बस रह गया भीतर
रक्तिम हृदय..
और लाल रक्त।
जो रिस रिस कर
घुलता जा रहा है
मिलता जा रहा है
अपने ही बेरंग पानी में…।।

Title: Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry