Hazara khushiya ghatt ne ikk gam bhulaun de lyi,
Ikk gam kaafi e zindagi gwaun de lyi..
ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਘੱਟ ਨੇ ਇੱਕ ਗਮ ਭੁਲਾਉਣ ਦੇ ਲਈ ,
ਇੱਕ ਗਮ ਕਾਫੀ ਹੈ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਗਵਾਉਣ ਦੇ ਲਈ ..
Hazara khushiya ghatt ne ikk gam bhulaun de lyi,
Ikk gam kaafi e zindagi gwaun de lyi..
ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਘੱਟ ਨੇ ਇੱਕ ਗਮ ਭੁਲਾਉਣ ਦੇ ਲਈ ,
ਇੱਕ ਗਮ ਕਾਫੀ ਹੈ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਗਵਾਉਣ ਦੇ ਲਈ ..
महर-ओ- वफ़ा की शमआ जलाते तो बात थी
इंसानियत का पास निभाते तो बात थी
जम्हूरियत की शान बढ़ाते तो बात थी
फ़िरक़ा परस्तियों को मिटाते तो बात थी
जिससे कि दूर होतीं कुदूरत की ज़ुल्मतें
ऐसा कोई चराग़ जलाते तो बात थी
जम्हूरियत का जश्न मुबारक तो है मगर
जम्हूरियत की जान बचाते तो बात थी
ज़रदार से यह हाथ मिलाना बजा मगर
नादार को गले से लगाते तो बात थी
बर्बाद होने का तो कोई ग़म नहीं मगर
अपना बनाके मुझको मिटाते तो बात थी
हिंदुस्तान की क़सम ऐ रेख़्ता हूँ ख़ुश
पर मुंसिफ़ी की बात बताते तो बात थी
“फिर आज युंहिं मौसम बदला, चहकती
देखो हर एक डाल है..
मद्धम सी बरसात हुई, छिल गई कई पेड़ों की छाल है..
हर पत्ते हर डाली ने पूछा, क्या दर्द हुआ? क्या तेरा हाल है..
कहा हुआ हूं, नया मैं फिर से, क्या जानो तुम कुदरत कमाल है..
मुझको ताकत दी है इतनी, शक्ति मेरी बेमिसाल है..
हर जीव में सांसें भरता हूं, सब करते मेरा इस्तेमाल है..
काटेंगे मुझे तो भुगतेंगे, कुदरत का कहर सबसे विशाल है..
बे-मौसम जो मौसम बदल रहे हैं, जवाब पता है, फिर भी सवाल है..”