Gama da tamasha Na bnaya kar evein
Jinnu hnju farak nahi paunde ohnu lafz ki paunge..!!
ਗਮਾਂ ਦਾ ਤਮਾਸ਼ਾ ਨਾ ਬਣਾਇਆ ਕਰ ਐਵੇਂ
ਜਿਹਨੂੰ ਹੰਝੂ ਫ਼ਰਕ ਨਹੀਂ ਪਾਉਂਦੇ ਓਹਨੂੰ ਲਫ਼ਜ਼ ਕੀ ਪਾਉਣਗੇ..!!
Gama da tamasha Na bnaya kar evein
Jinnu hnju farak nahi paunde ohnu lafz ki paunge..!!
ਗਮਾਂ ਦਾ ਤਮਾਸ਼ਾ ਨਾ ਬਣਾਇਆ ਕਰ ਐਵੇਂ
ਜਿਹਨੂੰ ਹੰਝੂ ਫ਼ਰਕ ਨਹੀਂ ਪਾਉਂਦੇ ਓਹਨੂੰ ਲਫ਼ਜ਼ ਕੀ ਪਾਉਣਗੇ..!!
राजनीति की दुनिया में खेल बहुत है,
कोई जीता है, कोई हारा है।
सत्ता की भूख और वाद-विवाद,
मन में जलती चिंगारी है।
राजनेताओं की रंगीन छलावा,
जनता को वहमों में बँधाता है।
कुछ वादे खाली और कुछ झूले धूले,
आम आदमी को खोखला बनाता है।
वाद-विवाद के आगे सच्चाई छिपती,
लोकतंत्र की मूल्यों पर भारी है।
शोर और तामझाम में खो गई है,
सम्मान, सद्भाव और आदर्शि है।
नीतिबद्धता और समर्पण की कमी,
राजनीति को कर रही है मिट्टी।
सच्ची सेवा की बजाए प्रतिष्ठा,
हौसले को तोड़ रही है मिट्टी।
चाहे जितना बदले युगों का सफ़र,
राजनीति का रंग हर बार वही।
प्रशासनिक शक्ति की लालसा में,
जनता भूल जाती है खुद को वही।
महर-ओ- वफ़ा की शमआ जलाते तो बात थी
इंसानियत का पास निभाते तो बात थी
जम्हूरियत की शान बढ़ाते तो बात थी
फ़िरक़ा परस्तियों को मिटाते तो बात थी
जिससे कि दूर होतीं कुदूरत की ज़ुल्मतें
ऐसा कोई चराग़ जलाते तो बात थी
जम्हूरियत का जश्न मुबारक तो है मगर
जम्हूरियत की जान बचाते तो बात थी
ज़रदार से यह हाथ मिलाना बजा मगर
नादार को गले से लगाते तो बात थी
बर्बाद होने का तो कोई ग़म नहीं मगर
अपना बनाके मुझको मिटाते तो बात थी
हिंदुस्तान की क़सम ऐ रेख़्ता हूँ ख़ुश
पर मुंसिफ़ी की बात बताते तो बात थी