
Gawah ne sachii mohobbat de..!!

Kuj ta hai es masum dil ch
Evein ta nahi har lafaz ch usda jikar ho reha..!!
ਕੁਝ ਤਾਂ ਹੈ ਇਸ ਮਾਸੂਮ ਦਿਲ ‘ਚ
ਐਵੇਂ ਤਾਂ ਨਹੀਂ ਹਰ ਲਫ਼ਜ਼ ‘ਚ ਓਹਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਹੋ ਰਿਹਾ..!!
ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा
मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है
बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है
बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ’ मैं ने किया
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है
रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र
मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना’त हो गई है