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Ik taraf lahlahat chaman zindagi || Hindi latest shayari

Zindagi

Ik Taraf Lahlahata Chaman Zindagi
Ik Taraf Hai Khizaan Aur Ghutan Zindagi

Ik Taraf Himmat-O-Hausla ,Azm Bhi
Ik Taraf Uljhanein Aur Thakan Zindagi

Zindagi Aik Paheli Hai Aur Khud Hi Hal
Ab Kaho Kya Hai Aye AhleFan Zindagi

Neend Bhi Khawaab Bhi Aur Tabeer Bhi
Ik Tilasm-e-Purasraar-O-Fan Zindagi

Saltnat ,Takht-O-Taaj Aur Shahanshah Bhi
Tauq, Zanjeerein ,Daar-O-Rasan Zindagi

Sarhadon Par Nigehbaan Bhi , Ghaat Bhi
Maujzan Zindagi , Dilshikan Zindagi

Ye Hi Jashn-O-Charaaghaan Hai Aur Qahqahe
Maatam-O-Marsia , Nauhazan Zindagi

Ye Hi Shatranj Ke Mohre , Ye Hi Bisaat
Haar Aur Jeet Ka Air Chalan Zindagi

Rahguzar Bhi Hai Raahi Bhi Manzil Bhi Khud
Raahbar Bhi Zindagi Raahzan Zindagi

Khud Haqiqat Hai Aur Khud Hi Afsaanaa Bhi
Raaz Hai Az-zameen Taagagan Zindagi

Ye Hi Mahfil Bhi Hangama Sannata Bhi
Khud Hi Sanjeeda Khud Baankpan Zindagi

Zindagi Hai Ke Paani Ka Ik Bulbula
Phir Bhi Hai Kis Qadar Maujzan Zindagi

Hai Yahi Zindagi Aik Phoolon Ki Sej
Aur Kabhi Kaanton Ki Hai Chubhan Zindagi

Aashna Aur Shanasaa Bhi Anjaan Bhi
Baawatan Zindagi Bewatan Zindagi

.. Rekhta Pataulvi

Title: Ik taraf lahlahat chaman zindagi || Hindi latest shayari

Best Punjabi - Hindi Love Poems, Sad Poems, Shayari and English Status


Hindi poetry || zindagi

चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग,
फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग।
वाजियों-गजों की लोथों में, गिर रहे मनुज के छिन्न अंग,
बह रहा चतुष्पद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग।

गत्वर, गैरेय,सुघर भूधर से, लिए रक्त-रंजित शरीर,
थे जूझ रहे कौंतेय-कर्ण, क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर।
दोनों रण-कुशल धनुर्धर नर, दोनों सम बल, दोनों समर्थ,
दोनों पर दोनों की अमोघ, थी विशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ।

इतने में शर के लिए कर्ण ने, देखा ज्यों अपना निषंग,
तरकस में से फुंकार उठा, कोई प्रचंड विषधर भुजंग।
कहता कि कर्ण ! मैं अश्वसेन, विश्रुत भुजंगों का स्वामी हूँ,
जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूँ।

बस एक बार कर कृपा धनुष पर, चढ़ शख्य तक जाने दे,
इस महाशत्रु को अभी तुरत, स्पंदन में मुझे सुलाने दे।
कर वमन गरल जीवन-भर का, संचित प्रतिशोध, उतारूँगा,
तू मुझे सहारा दे, बढ़कर, मैं अभी पार्थ को मारूँगा।

राधेय ज़रा हँसकर बोला, रे कुटिल ! बात क्या कहता है?
जय का समस्त साधन नर का, अपनी बाहों में रहता है।
उसपर भी साँपों से मिलकर मैं मनुज, मनुज से युद्ध करूँ?
जीवन-भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुद्ध करूँ?
तेरी सहायता से जय तो, मैं अनायास पा जाऊँगा,
आनेवाली मानवता को, लेकिन क्या मुख दिखलाऊँगा?
संसार कहेगा, जीवन का, सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया,
प्रतिभट के वध के लिए, सर्प का पापी ने साहाय्य लिया।

रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी,
सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुरग्राम-घरों में भी।
ये नर-भुजंग मानवता का, पथ कठिन बहुत कर देते हैं,
प्रतिबल के वध के लिए नीच, साहाय्य सर्प का लेते हैं।
ऐसा न हो कि इन साँपों में, मेरा भी उज्ज्वल नाम चढ़े,
पाकर मेरा आदर्श और कुछ, नरता का यह पाप बढ़े।
अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है,
संघर्ष, सनातन नहीं, शत्रुता, इस जीवन-भर ही तो है।

अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषांध बिगाड़ूँ मैं,
साँपों की जाकर शरण, सर्प बन, क्यों मनुष्य को मारूँ मैं?
जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता,
मैं किसी हेतु भी यह कलंक, अपने पर नहीं लगा सकता

Title: Hindi poetry || zindagi


doori shayari, DOOR REH NA SAKI

ਭਾਂਵੇ ਦਿਲ ਦੇ ਅੰਬਰ ਵਿੱਚ ਉਹ ਸਿਮਟ ਕੇ ਰਹਿ ਨਾ ਸਕੀ
ਪਰ ਮੇਰੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਤੋਂ
ਉਹ ਦੂਰ ਰਹਿ ਨਾ ਸਕੀ

Bhawe dil de ambar vich oh simat ke reh na saki
par meriyaan yaadan ton
oh door reh na saki

Title: doori shayari, DOOR REH NA SAKI