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JAL JAANA

Zindagi da chadeyaa suraj  ik din dhal jaana varde hanjuaan ne v sukna yaadan ohdiyaan ne v siveaan ch jal jaana

Zindagi da chadeyaa suraj
ik din dhal jaana
varde hanjuaan ne v sukna
yaadan ohdiyaan ne v
siveaan ch jal jaana


Best Punjabi - Hindi Love Poems, Sad Poems, Shayari and English Status


Zindgi ka har pal || Hindi Love Shayari

तुम्हें देखते है तो तुम्हे पाने का मन करता है
दूर हो जाते है तो मर जाने का मन करता है
हम करते है प्यार तुम्हे ना जाने क्यों
ज़िन्दगी का हर पल
तुम्हारे नाम कर जाने का मन करता है
ਤੁਮਹੇਂ ਦੇਖਤੇ ਹੈ ਤੋਂ ਤੁਮਹੇਂ ਪਾਨੇ ਕਾ ਮਨ ਕਰਤਾ ਹੈ
ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਤੇ ਹੈ ਤੋਂ ਮਰ ਜਾਣੇ ਕਾ ਮਨ ਕਰਤਾ ਹੈ
ਹਮ ਕਰਤੇ ਹੈ ਪਿਆਰ ਤੁਮਹੇਂ ਨਾ ਜਾਣੇ ਕਿਉ
ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਕਾ ਹਰ ਪਲ
ਤੁਮ੍ਹਾਰੇ ਨਾਮ ਕਰ ਜਾਣੇ ਕਾ ਮਨ ਕਰਤਾ ਹੈ

Tumhe dekhte hai to tumhe pane ka man karta hai
Door ho jate hai to mar jane ka man karta hai
Hum  karte hai pyar tumhe na jane kyu
Zindgi ka har pal
tumhare naam kar jane ka man karta hai

Title: Zindgi ka har pal || Hindi Love Shayari


Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry

थी मै,शांत चित्त बहती नदी – सी
तलहटी में था कुछ जमा हुआ
कुछ बर्फ – सा ,कुछ पत्थर – सा।
शायद कुछ मरा हुआ..
कुछ अधमरा सा।
छोड़ दिया था मैंने
हर आशा व निराशा।
होंठो में मुस्कान लिए
जीवन के जंग में उलझी
कभी सुलगी,कभी सुलझी..
बस बहना सीख लिया था मैंने।
जो लगी थी चोट कभी
जो टूटा था हृदय कभी
उन दरारों को सबसे छुपा लिया था
कर्तव्यों की आड़ में।
फिर एक दिन..
हवा के झोंके के संग
ना जाने कहीं से आया
एक मनभावन चंचल तितली
था वो जरा प्यासा सा
मनमोहक प्यारा सा।
खुशबूओं और पुष्पों
की दुनिया छोड़
सारी असमानताओं और
बंधनों को तोड़
सहमी – बहती नदी को
खुलकर बहना सीखा गया,
अपने प्रेम की गरमी से
बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया।
पाकर विश्वास कोमल भावों से जोड़े नाते का
सारी दबी अपेक्षाएं हो गई फिर जीवंत
लेकिन क्या पता था –
होगा इसका भी एक दिन अंत !
तितली को आयी अपनों की याद
मुड़ चला बगिया की ओर
सह ना सकी ये देख नदी
ये बिछड़न ये एकाकीपन
रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें
दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी
सिसक सिसक कर उसे बतलाई।
नहीं सुनना था उसे,
नहीं सुन पाया वो।
नहीं रुकना था उसे,
नहीं रुक पाया वो।
तेज उफान आया नदी में,
क्रोध और अवसाद
छाया मन में,
फिर छला था
नेह जता कर किसी ने।
आवाज देती..लहरें,
उठती और गिरती
किनारों से टकराती,
हो गई घायल।
बीत गए असंख्य क्षण
उसकी वापसी की आस में
लेकिन सामने था, तो सिर्फ शून्य।
हो गई नदी फिर से मौन..
छा गई निरवता।
लेकिन अबकी बार,
नहीं जमा कुछ तलहटी में
कुछ बर्फ सा,
कुछ पत्थर सा।
बस रह गया भीतर
रक्तिम हृदय..
और लाल रक्त।
जो रिस रिस कर
घुलता जा रहा है
मिलता जा रहा है
अपने ही बेरंग पानी में…।।

Title: Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry