कुछ ख्वाहिशें तो कुछ नुमाहिशें हैं, चेहरे पर मुस्कुराहट फिर भी आंखों में बरिशें हैं न जाने कहां रूठ कर बैठा है वक्त मुझसे क्योंकि आज भी उसको पाने की खुदा से गुजारिशें हैं।
कुछ ख्वाहिशें तो कुछ नुमाहिशें हैं, चेहरे पर मुस्कुराहट फिर भी आंखों में बरिशें हैं न जाने कहां रूठ कर बैठा है वक्त मुझसे क्योंकि आज भी उसको पाने की खुदा से गुजारिशें हैं।
ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा
मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है
बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है
बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ’ मैं ने किया
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है
रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र
मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना’त हो गई है
ਅੱਖਰਾਂ ਵਿੱਚ ਲਿਖਕੇ ਤੈਨੂੰ
ਤੱਕਦਾ ਰਹਿੰਨਾ ਮੈਂ
ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਦੱਬੇ ਜੋ ਜਜ਼ਬਾਤ ਮੇਰੇ
ਤੈਨੂੰ ਕਲਮ ਰਾਹੀ ਕਹਿੰਦਾ ਮੈਂ
ਮਿੱਸ ਕਰਦਾ ਤੈਨੂੰ ਜਿੰਦਗੀ ਵਿੱਚ
ਉੱਠਦਾ ਤੇ ਬਹਿੰਦਾ ਮੈਂ
ਕੋਈ ਸ਼ਬਦ ਨੀ ਕਿ ਭਾਈ ਰੂਪੇ ਵਾਲਾ ਦੱਸ ਸਕੇ
ਪ੍ਰੀਤ ਤੇਰੀ ਹਰ ਪਲ ਦੂਰੀ ਕਿੱਦਾ ਸਹਿੰਦਾ ਮੈਂ❤️