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Fir bhi kareeb raho
इश्क़ है …न चाह है तुझे पाने की,
फिर भी करीब रहो ये अच्छा लगता है,,
ख्वाब है न हकीकत है.. दरमियाँ अपने
फिर भी तुम्हें सोचना अच्छा लगता है,,
दूर हो न करीब ही हो मेरे “जाना”
फिर भी तू हमकदम हो अच्छा लगता है,,
पराया है न अपना ही है तू मेरा
फिर भी तेरा साथ अच्छा लगता है।।🌻🌻
Title: Fir bhi kareeb raho
Woh raaho ka hamsafar || dost shayari
वो खुशियों की डगर, वो राहों में हमसफ़र,
वो साथी था जाना पहचाना,
दिल हैं उसकी यादों का दीवाना
वो साथ था जाना पहचाना
गम तो कई उसने भी देखे,
पर राहों में चले खुशियों को लेके
दिल चाहता हैं हर दम हम साथ चलें,
पर इस राह में कई काले बादल हैं घने
वो साथ था जाना पहचाना
मेरे आसुओं को था जिसने थामा,
मुझसे ज्यादा मुझको पहचाना
चारों तरफ था घनघोर अँधियारा,
बनकर आया था जीवन में उजियारा
वो साथ था जाना पहचाना
गिन-गिन कर तारे भी गिन जाऊ,
पर उसकी यादों को भुला ना पाऊ
कहता था अक्सर हर दिन हैं मस्ताना,
हर राह में खुशियों का तराना
वो साथ था जाना पहचाना
कहता हैं मुझे भूल जाना,
अपनी यादों में ना बसाना
देना चाहूँ हर ख़ुशी उसे,
इसीलिए, मिटाना चाहूँ दिल से
वो साथ था जाना पहचाना
तरुण चौधरी
