माना गलती तुम्हारी नहीं मेरी थी
पर वो प्यार से बुलाने की आदत तो तेरी थी
हम तो प्यार करना भी नहीं चाहते
पर हमारे आग को जलाने के लिए चिंगारी भी तेरी थी…
माना गलती तुम्हारी नहीं मेरी थी
पर वो प्यार से बुलाने की आदत तो तेरी थी
हम तो प्यार करना भी नहीं चाहते
पर हमारे आग को जलाने के लिए चिंगारी भी तेरी थी…

हर वक्त एक अंजान साया सा, मेरे पास घूमता रहता है..
मेरे दिल से जुडा है वो शायद, मेरी रूह चूमता रहता है..
बताता नहीं है मुझको कुछ, और ना मुझसे कुछ कहता है..
मेरी मर्जी हो या ना हो मगर, शागिर्द बना वो रहता है..
दिन और रात वो बस मेरे, आगोश में पलता रहता है..
मैं चाहुं या फिर ना चाहुं, मेरे साथ वो चलता रहता है..
हर खुशी बांटता है मेरी, हर गम मेरे संग सेहता है..
आखिर साया है ये किसका, ये सवाल जहन में रहता है..