narazgi tumari | sad shayari
Tum naraz ho mujse..isliye..
Mein naraz Hun khud se

Asi rehnde c door ehna ishq mohalleyan ton
Dil harde nhi c piche kise dukki tikki..!!
Sanu chahun valeya di vi koi kami Na c sajjna
Kade sochi gall tere te hi aa ke kyu mukki..!!
ਅਸੀਂ ਰਹਿੰਦੇ ਸੀ ਦੂਰ ਇਹਨਾਂ ਇਸ਼ਕ ਮੋਹੱਲਿਆਂ ਤੋਂ
ਦਿਲ ਹਾਰਦੇ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਿੱਛੇ ਕਿਸੇ ਦੁੱਕੀ ਤਿੱਕੀ..!!
ਸਾਨੂੰ ਚਾਹੁਣ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਵੀ ਕੋਈ ਕਮੀ ਨਾ ਸੀ ਸੱਜਣਾ
ਕਦੇ ਸੋਚੀਂ ਗੱਲ ਤੇਰੇ ‘ਤੇ ਹੀ ਆ ਕੇ ਕਿਉਂ ਮੁੱਕੀ..!!
दिवाली पर पापा को बोनस मिलता था तनख्वाह थोड़ी ज्यादा आती थी सबको मालूम था दिवाली पर भी नए कपड़े लेने के लिए पैसे गिनकर मिलते थे कोई अगर बीमार हो जाए तो वो नए कपड़े भी कैंसल हो जाते थे। बचपन से ही एडजस्ट करने की आदत लग जाती है ये आदत अच्छी हो होती है पर कभी कभी बुरी भी होती है। धीरे धीरे बड़े हुए तो पता था मम्मी पापा को कुछ बनकर दिखाना है ये ख्वाब साथ लेकर चला पर बाहर निकले घर से तो ये पता चला कि जो मेरा ख्वाब है वही सबका भी ख्वाब था सबको अपनी जिंदगी में मेरी तरह ही कुछ करना था। जैसे तैसे एक नौकरी लगी वो भी मेरी पसंद की नही थी पर पापा का हाथ बंटाने के लिए भी तो कुछ करना था अपने दिल को समझकर वो नौकरी कर ली मुझे नौकरी लगी ये सुनकर मम्मी पापा दोनो खुश हो जाए पापा की आखों से तो आंसू ही आ गए आंखो से निकलते आंसू भी उस दिन मुझसे बात कर रहे थे मानो वो ये कह रहे थे की अब मेरे कंधो का थोड़ा बोझ कम हुआ मेरे साथ कोई कमाने वाला आ गया। उस दिन से मैंने वो नौकरी ज्वाइन कर ली और उसकी भी आदत सी पड़ गई।