” Kuch is trha uljhi he mere hatho ki lakeere
uski lakiro ke sath…
Adhure jo hm hue,
To muqammal wo b nhi honge.…”
By Zareen khan…
” Kuch is trha uljhi he mere hatho ki lakeere
uski lakiro ke sath…
Adhure jo hm hue,
To muqammal wo b nhi honge.…”
By Zareen khan…
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के
इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दिगार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के
भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वलवले दिलए-ना-कर्दाकार के
Tenu ishq byan kar ta rahe haan
par bina byan kitteya..!!
ਤੈਨੂੰ ਇਸ਼ਕ ਬਿਆਨ ਕਰ ਤਾਂ ਰਹੇ ਹਾਂ
ਪਰ ਬਿਨਾਂ ਬਿਆਨ ਕੀਤਿਆਂ..!!