Muskurahat ke peechhe ka raaz tum ho,
jo padhti hu roz woh nwaaz tum ho,
gungunati hu jo main khud likh kar,
uske peechhe ki jaan meri awaaz tum ho…..
Muskurahat ke peechhe ka raaz tum ho,
jo padhti hu roz woh nwaaz tum ho,
gungunati hu jo main khud likh kar,
uske peechhe ki jaan meri awaaz tum ho…..
मोहब्बत तर्क की मैं ने गरेबाँ सी लिया मैं ने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने
अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने
उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैं ने
बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिए मैं ने बहुत दिन जी लिया मैं ने
