Shayad mein hi galat hoon, jo log mujhe sahi karne mein lge hein,
Jo kam meri zindagi tabaah kar de, wahi karne mein lge hein.
शायद मैं ही ग़लत हूं जो लोग मुझे सही करने में लगे हैं,
जो काम मेरी ज़िन्दगी तबाह कर दे, वही करने में लगे हैं।
Shayad mein hi galat hoon, jo log mujhe sahi karne mein lge hein,
Jo kam meri zindagi tabaah kar de, wahi karne mein lge hein.
शायद मैं ही ग़लत हूं जो लोग मुझे सही करने में लगे हैं,
जो काम मेरी ज़िन्दगी तबाह कर दे, वही करने में लगे हैं।
“सोचता हूँ, के कमी रह गई शायद कुछ या
जितना था वो काफी ना था,
नहीं समझ पाया तो समझा दिया होता
या जितना समझ पाया वो काफी ना था,
शिकायत थी तुम्हारी के तुम जताते नहीं
प्यार है तो कभी जमाने को बताते क्यों नहीं,
अरे मुह्हबत की क्या मैं नुमाईश करता
मेरे आँखों में जितना तुम्हें नजर आया,
क्या वो काफी नहीं था I
सोचता हूँ के क्या कमी रह गई,
क्या जितना था वो काफी नहीं था
“सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
उनके मुँह से निकले सारे अल्फाजों को याद कर लूँ कभी I
ऐसी क्या मज़बूरी होगी उनकी की हम याद नहीं आते I
सोचता हूँ तोहफा भेज कर अपनी याद दिला दूँ कभी I
सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
usne ek baar jo dekha
wo kya dekha
ke mohobat ho gai hame unse
fir ek baar na usne dekha
उसने एक बार जो देखा
वो क्या देखा
के मोहोबत हो गई हमें उनसे
फिर एक बार न उसने देखा