

कई हसीनाओं का दिल तो मुझपर, सिर्फ इसलिए भी आ जाता है..
क्यूंकि दिल में मेरे कुछ और होता है, जुबान पर कुछ और आता है..
कभी जो मेरी आंखें मेरे दिल की, बातें बयां गर करती हैं..
फिर चेहरा मेरा कुछ बोले बिना, हल्का सा सिर्फ मुस्कुराता है..
हल्का सा सिर्फ मुस्कुराता है..
तिश्नगी थी मुलाक़ात की,
उस से हाँ मैंने फिर बात की।
दुश्मनी मेरी अब मौत से,
ज़िंदगी हाथ पे हाथ की।
सादगी उसकी देखा हूँ मैं,
हाँ वो लड़की है देहात की।
तुमने वादा किया था कभी,
याद है बात वो रात की।
अब मैं कैसे कहूँ इश्क़ इसे,
बात जब आ गई ज़ात की।
मुझसे क्या दुश्मनी ऐ घटा,
क्यों मेरे घर पे बरसात की।
हमको मालिक ने जितना दिया,
सब ग़रीबों में ख़ैरात की।
तू कभी मिल तो मालूम हो,
क्या है औक़ात औक़ात की।