जमीन जल चुकी है आसमान बाकी है
वो जो खेतों की मेड़ो पर उदास बैठे हैं
उन्हीं की आंखों में अबतक ईमान बाकी है
बादलों अब तो बरस जाओ सूखी जमीनों पर
किसी का घर गिरवी है और किसी का लगान बाकी है
जमीन जल चुकी है आसमान बाकी है
वो जो खेतों की मेड़ो पर उदास बैठे हैं
उन्हीं की आंखों में अबतक ईमान बाकी है
बादलों अब तो बरस जाओ सूखी जमीनों पर
किसी का घर गिरवी है और किसी का लगान बाकी है
“सोचता हूँ, के कमी रह गई शायद कुछ या
जितना था वो काफी ना था,
नहीं समझ पाया तो समझा दिया होता
या जितना समझ पाया वो काफी ना था,
शिकायत थी तुम्हारी के तुम जताते नहीं
प्यार है तो कभी जमाने को बताते क्यों नहीं,
अरे मुह्हबत की क्या मैं नुमाईश करता
मेरे आँखों में जितना तुम्हें नजर आया,
क्या वो काफी नहीं था I
सोचता हूँ के क्या कमी रह गई,
क्या जितना था वो काफी नहीं था
“सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
उनके मुँह से निकले सारे अल्फाजों को याद कर लूँ कभी I
ऐसी क्या मज़बूरी होगी उनकी की हम याद नहीं आते I
सोचता हूँ तोहफा भेज कर अपनी याद दिला दूँ कभी I
सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
Kujh gehra likhna chahune aa
jehdhaa dhuk tere tak jawe
padh bhawe saari duniyaa lawe
par samajh tainu hi aawe
ਕੁੱਝ ਗਹਿਰਾ ਲਿਖਣਾ ਚਾਹੁੰਨੇ ਆਂ
ਜਿਹੜਾ ਢੁੱਕ ਤੇਰੇ ਤੱਕ ਜਾਵੇ
ਪੜ ਭਾਵੇਂ ਸਾਰੀ ਦੁਨੀਆਂ ਲਵੇ
ਪਰ ਸਮਝ ਤੈਨੂੰ ਹੀ ਆਵੇ