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अर्धांगिनी पर कविता
जो दुख में भी साथ देती है
जो मुश्किल हालत में साथ होती है
जो ना छोड़ती है साथ कभी
उसे ही अर्धांगिनी कहते है।
जो खुदका घर छोड़ देती है
पति के घर को अपना समझती है
जो रिश्तों को बखूबी निभाती है
उसे ही अर्धांगिनी कहते है।
जो आंख बंद कर पति पर विश्वास दिखाती है
तुम हर जंग जीतोगे भरोसा दिलाती है
जो सफलता की हकदार कहलाती है
उसे ही अर्धांगिनी कहते है।
जो हर वचनों को निभाती है
जो सारा जनम पति की बनकर रहती है
जो हाथ पकड़कर चलती है
उसे ही अर्धांगिनी कहते है।
जो कभी पत्नि बन जाती है
तो कभी बहू बन जाती है
जो दिलाती है हक पिता बनने का
उसे ही अर्धांगिनी कहते हैं।
Title: अर्धांगिनी पर कविता
Kirdaar || hindi shayari
बोहोत बोलती हुं में मगर मुझे बात करने का तरीका नहीं आता
देखती हुं आइना रोज में खुद को मगर मुझे संवारना नही आता
रोता देख किसी को रो देती हुं मैं भी मुझे रोते को हंसाने का हुनर नही आता
तन्हा भी बड़ी शान से रहती हु में मुझे काफिलों में खुद को शुमार करना नही आता
में सर्द लहजों में ही बोलती हुं तल्ख बातें मुझे तल्ख लहजों से दिलों का तोड़ना नहीं आता
ओर में जो हुं वही नजर आती हु मुझे किरदार बदल बदल कर मिलना नही आता।🙌💯
