
Duja mar mar ke
Eh kaisi saja ho gayi zindagi meri nu..!!

बादशाह अकबर को शिकार करना बहुत पसंद था। एक बार की बात है, बादशाह अकबर अपने सैनिकों के साथ शिकार पर निकले। शिकार करते-करते वो इतने आगे चले गए कि वो अपने दल से छूट गए। उनके साथ बस कुछ ही सैनिक रह गए थे। अब शाम होने को थी और सूरज ढलने वाला था। साथ ही अकबर और उनके साथ के सैनिकों को भूख भी सताने लगी थी।
बादशाह अकबर को शिकार करना बहुत पसंद था। एक बार की बात है, बादशाह अकबर अपने सैनिकों के साथ शिकार पर निकले। शिकार करते-करते वो इतने आगे चले गए कि वो अपने दल से छूट गए। उनके साथ बस कुछ ही सैनिक रह गए थे। अब शाम होने को थी और सूरज ढलने वाला था। साथ ही अकबर और उनके साथ के सैनिकों को भूख भी सताने लगी थी
काफी दूर निकल आने पर बादशाह अकबर को यह एहसास हुआ कि वो रास्ता भटक गए हैं। वहां आस-पास कोई नजर भी नहीं आ रहा था, जिससे रास्ते के बारे में पूछा जा सकता था। थोड़ी दूर और चलने पर उन्हें एक तिराहा नजर आया। बादशाह को यह देख कर थोड़ी खुशी हुई कि चलो इनमें से कोई न कोई रास्ता राजधानी तक तो जाता ही होगा।
लेकिन, सभी इसी उलझन में थे कि किस रास्ते पर चला जाए। तभी सैनिकों की नजर सड़क किनारे खड़े एक छोटे से लड़के पर पड़ी। वह लड़का बड़ी हैरानी से महाराज के घोड़े और सैनिकों के हथियारों को देख रहा था। सैनिकों ने उस बालक को पकड़कर महाराज के सामने पेश किया।
बादशाह अकबर ने लड़के से पूछा, “ऐ लड़के। इनमें से कौन सा रास्ता आगरा जाता है?” यह बात सुनकर वह बच्चा जोर-जोर से हंसने लगा। यह देखकर राजा को बहुत गुस्सा आया। लेकिन, उन्होंने शांत भाव से उससे उसकी हंसी का कारण पूछा। लड़के ने जवाब दिया, “यह रास्ता चल नहीं सकता है, तो यह आगरा कैसे जाएगा। आगरा पहुंचने के लिए तो आपको खुद चलना पड़ेगा।”
महाराज उस लड़के की सूझबूझ को देख कर चकित रह गए। उन्होंने प्रसन्न होकर उस बच्चे का नाम पूछा। लड़के ने जवाब में अपना नाम महेश दास बताया। महाराज ने उसे इनाम में सोने की अंगूठी दी और दरबार में आने का न्योता दिया। इसके बाद बादशाह अकबर ने लड़के से पूछा, “क्या तुम मुझे बता सकते हो कि किस रास्ते पर चलने से मैं आगरा पहुंच पाऊंगा?” लड़के ने बड़ी ही शालीनता से सही रास्ता बताया और महाराज अपने सैनिकों के साथ आगरा की ओर चल पड़े।
यही लड़का बड़ा होकर बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुआ और बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक कहलाया।
Na me moman vich maseetan na me vich kufar diyaan reetan
na me pakaan vich paleetan, na me moosa na faraon
bullah ki jaane me kaun
Na me ander bed katebaan, na vich bhangaan na sharaaban
na vich rindaa mast khraaban, na vich jagan na vich saun
bullah ki jaane me kaun
na vich shaadi na gamnaaki, na me vich paleeti paki
na me aabi na me khaki, na me aatish na me paun
bullah ki jaane me kaun
na me arbi na lahauri, na me hindi shehar nagauri
na hindu na turak pashori, na me rehnda vich nadaun
bullah ki jaane me kaun
na me bhet majahab da payea, na me aadam hava jamayea
na me aapna naam dharayea, na vich baithan na vich bhaun
bullah ki jaane me kaun
awal aakhar aap nu jaana, na koi dooja hor pachhana
maithon hor na koi siyaana, bullah shah khadha hai kaun
bullah ki jaane me kaun
ਨਾ ਮੈਂ ਮੋਮਨ ਵਿਚ ਮਸੀਤਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਵਿਚ ਕੁਫ਼ਰ ਦੀਆਂ ਰੀਤਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਪਾਕਾਂ ਵਿਚ ਪਲੀਤਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮੂਸਾ ਨਾ ਫਰਔਨ ।
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ ਮੈਂ ਕੌਣ ।
ਨਾ ਮੈਂ ਅੰਦਰ ਬੇਦ ਕਿਤਾਬਾਂ, ਨਾ ਵਿਚ ਭੰਗਾਂ ਨਾ ਸ਼ਰਾਬਾਂ,
ਨਾ ਵਿਚ ਰਿੰਦਾਂ ਮਸਤ ਖਰਾਬਾਂ, ਨਾ ਵਿਚ ਜਾਗਣ ਨਾ ਵਿਚ ਸੌਣ ।
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ ਮੈਂ ਕੌਣ ।
ਨਾ ਵਿਚ ਸ਼ਾਦੀ ਨਾ ਗ਼ਮਨਾਕੀ, ਨਾ ਮੈਂ ਵਿਚ ਪਲੀਤੀ ਪਾਕੀ,
ਨਾ ਮੈਂ ਆਬੀ ਨਾ ਮੈਂ ਖ਼ਾਕੀ, ਨਾ ਮੈਂ ਆਤਿਸ਼ ਨਾ ਮੈਂ ਪੌਣ ।
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ ਮੈਂ ਕੌਣ ।
ਨਾ ਮੈਂ ਅਰਬੀ ਨਾ ਲਾਹੌਰੀ, ਨਾ ਮੈਂ ਹਿੰਦੀ ਸ਼ਹਿਰ ਨਗੌਰੀ,
ਨਾ ਹਿੰਦੂ ਨਾ ਤੁਰਕ ਪਸ਼ੌਰੀ, ਨਾ ਮੈਂ ਰਹਿੰਦਾ ਵਿਚ ਨਦੌਣ ।
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ ਮੈਂ ਕੌਣ ।
ਨਾ ਮੈਂ ਭੇਤ ਮਜ਼ਹਬ ਦਾ ਪਾਇਆ, ਨਾ ਮੈਂ ਆਦਮ ਹਵਾ ਜਾਇਆ,
ਨਾ ਮੈਂ ਆਪਣਾ ਨਾਮ ਧਰਾਇਆ, ਨਾ ਵਿਚ ਬੈਠਣ ਨਾ ਵਿਚ ਭੌਣ ।
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ ਮੈਂ ਕੌਣ ।
ਅੱਵਲ ਆਖਰ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣਾਂ, ਨਾ ਕੋਈ ਦੂਜਾ ਹੋਰ ਪਛਾਣਾਂ,
ਮੈਥੋਂ ਹੋਰ ਨਾ ਕੋਈ ਸਿਆਣਾ, ਬੁਲ੍ਹਾ ਸ਼ਾਹ ਖੜ੍ਹਾ ਹੈ ਕੌਣ ।
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ ਮੈਂ ਕੌਣ ।