
fer ke ni langhi da
sajjna ve sajjan ban ke
sajjan ni thhaggi da

क्या वक्त ये मेरे दरमियां है,
किसी ने बताया नहीं मुझमें क्या कमियां है,
शाम की खुशियों में गम का अंधेरा क्यूं लाएं,
आज दिल की सुनकर बाहर निकला जाए...
कैद कर लिया है खुद को इन बेड़ियों में,
क्या फर्क है अब मुझमें और कैदियों में,
इन अंजान गलियों में आज थोड़ा फिसला जाए,
आज दिल की सुनकर बाहर निकला जाए...
घर मेरा एक बरगद है…..
मेरे पापा जिसकी जड़ है…!!
घनी छायो है मेरी माँ..
यही है मेरे आसमान…!!
पापा का है प्यार अनोखा..
जैसे शीतल हवा का झोका …!!
माँ की ममता सबसे प्यारी …
सबसे सुंदर सबसे नयारी….!!
हाथ पकड़ चलना सिखलाते
पापा हमको खूब घूमते ….!!
माँ मलहम बनकर लग जाती …
जब भी हमको चोट सताती..!!
माँ पापा बिन दुनिया सुनी
जैसे तपती आग की धुनी..!!
माँ ममता की धारा है …
पिता जीने का सहारा है…!!