हदें शहर से निकली तो गांव गांव चली
कुछ यादें मेरे संग पांव-पांव चली
सफर में धूप का हुआ तो तजुर्बा हुआ
वो जिंदगी ही क्या जो छांव-छांव चली
हदें शहर से निकली तो गांव गांव चली
कुछ यादें मेरे संग पांव-पांव चली
सफर में धूप का हुआ तो तजुर्बा हुआ
वो जिंदगी ही क्या जो छांव-छांव चली
किसी का जगह कोई ले नहीं सकते।
इस ज़माने में भी महान होना चाहिए, जैसे पुराने ज़माने में थे।
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इंसान मरने के बाद भगवान बन जाते।
जीवित दशा में कोई उसके प्रतिभा और योग्यता को पहचान नहीं पते।
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अच्छे घर की इंसान अब राजनीति नहीं करते।
जो हर क्षेत्र में बेकार है, वह सिर्फ नेता बनते।
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यह मत पूछो क्यों नहीं मिला।
सिर्फ यह देखो क्या मिला।
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जो ज्यादा पूछता है, वह मुर्ख नहीं, वह जानना चाहता है।
मुर्ख तो वह है, जो सब जानने का नाटक करता है।
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जो सब समझ के बैठा है, वह गिरने बाला है।
जो कभी संतुष्ट नहीं होता, वह विजय का माला पहनना है।
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औरत गुलाब जैसी।
सुगंधित पंखुड़ियां के अंदर छुपी हुई हत्यारा कांटे ऐसी।
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सुंदरता एक भयंकर रूप।
जो जीता, वह राजा; जो आत्मसमर्पण किया, वह बेवकूफ़।
गुज़र रहे हैं जिंदगी के पल कभी खुशी में तो कभी ग़मी में ।
होती हैं खुशियां कभी सातवें आसमा पर ओर कभी ज़मी पे।
Guzr rahe hain zindagi ke pall kabhi khushi me to kabhi gami me…..
hoti hain Khushyan kabhi saatwe aasma pr or kabhi zamee pe….