MASRUFIYAT MAIN JAB YAAD AATE HO KYA KAHOO G GHAZAB KARTE HO
HA LEKIN MASLA YEH TUMHAIN TO BA-AASAANI SAMAJH AAYE GA NAHI
مصروفیت میں جب یاد آتے ہو کیا کہوں جی غضب کرتے ہو
ہاں لیکن مسئلہ یہ تمھیں تو بآسانی سمجھ آئے گا نہیں
MASRUFIYAT MAIN JAB YAAD AATE HO KYA KAHOO G GHAZAB KARTE HO
HA LEKIN MASLA YEH TUMHAIN TO BA-AASAANI SAMAJH AAYE GA NAHI
مصروفیت میں جب یاد آتے ہو کیا کہوں جی غضب کرتے ہو
ہاں لیکن مسئلہ یہ تمھیں تو بآسانی سمجھ آئے گا نہیں
Gal taa karda, par gallan kyu ni karda
pehla waang mere gusse te meri aakad nu has ke kyu ni jarda
kehnde jida paani na deiye, taa ik rukh suk janda ae
bas use taraa gehri khamoshi naal gehra rishta titt janda ae
je me galat howa, mainu jhidhkeyaa kar
aiwe gal dil ch na dabeyaa kar
je main tainu har gal dasdi, tu v dil di har gal daseyaa kar
ਗੱਲ ਤਾਂ ਕਰਦਾ,ਪਰ ਗੱਲਾਂ ਕਿਓ ਨੀ ਕਰਦਾ..
ਪਹਿਲਾ ਵਾਂਗ ਮੇਰੇ ਗੁੱਸੇ ਤੇ ਮੇਰੀ ਆਕੜ ਨੂੰ ਹੱਸ ਕੇ ਕਿਉ ਨੀ ਜਰਦਾ..
ਕਹਿੰਦੇ ਜਿੱਦਾ ਪਾਣੀ ਨਾ ਦੇਈਏ,ਤਾਂ ਇਕ ਰੁੱਖ ਸੁੱਕ ਜਾਂਦਾ ਏ..
ਬਸ ਉਸੇ ਤਰਾਂ ਗਹਿਰੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਨਾਲ ਗਹਿਰਾ ਰਿਸ਼ਤਾ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦਾ ਏ..
ਜੇ ਮੈਂ ਗਲਤ ਹੋਵਾ,ਮੈਨੂੰ ਝਿੜਕਿਆ ਕਰ,
ਐਂਵੇ ਗੱਲ ਦਿਲ ਚ ਨਾ ਦਬਿਆ ਕਰ..
ਜੇ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਹਰ ਗੱਲ ਦੱਸਦੀ,ਤੂੰ ਵੀ ਦਿਲ ਦੀ ਹਰ ਗੱਲ ਦਸਿਆ ਕਰ..
फूलों ने कभी तोड़ने का दर्द कहा है,
कांटों ने ही हमेशा दुश्मनी निभाई है;
मोहब्बत भी फना का ही एक और नाम है,
यह रूसवा तो हुई है, पर इसने हमेशा वफादारी निभाई है।
ऐ चांद तेरे आने का सबब सबको मालूम नहीं,
कुछ लोग दिया जलाते हैं, और कुछ दिल जलाते हैं;
या वो अच्छी हैं या बुरी, हसरतें तो अपनी हैं,
मगर लोग अक्सर दाग तुझ पर लगाते हैं।
ऐ मेरे दोस्त तू समन्दर बन जा,
क्या खोया क्या पाया इसकी चाहत न कर;
तेरे अंदर ही एक मुकम्मल जहां है,
तू बाहर से किसी और की आस न कर।
मुमकिन है कि मंजिलें मुझसे दूर बहुत हैं,
पर रास्ते पर चलना मेरी फितरत बन गयी है;
उजाले समेटने में कोई वाहवाही नहीं,
अन्धेरों में रोशनी करना मेरी आदत बन गयी है।
ऐसे चलो कि चल के फिर गिरना न पड़े,
इतना उठो कि उठ के फिर झुकना न पड़े;
लेकिन गिरना, उठना तेरे बस में नहीं ऐ दोस्त,
इसलिए उसका हाथ पकड़ के चलो कि फिर रोना न पड़े।
मां के हाथों की बरकत का अंदाजा इस से हो गया,
थी एक वक्त की रोटी हर रोज,
और तीस वर्ष तक गुजारा हो गया;
आज रोटी तो है हर वक्त की, लेकिन वो वक्त कहीं पर खो गया।
ऐ जिंदगी, ये तेरे सवाल की तारीफ नहीं,
यह मेरे जवाब का हुनर कि जिंदगी की उलझने सुलझती चली गयीं;
मैं तो बस अपने दिल की कह रहा था,
और कहानियां बनती चली गयीं।
न थी जिंदगी से शिकायत,
न वक्त से कुछ गिला था;
जो मुझको नहीं मिला,
वो खुद मेरा ही सिला था;
मदद-ओ-मशवरे कम नहीं थे मददगारों के,
पर अफसोस जो तकदीर ने दिया था वह दर्द ही मुझे मिला था।
ऐ वतन कर्ज तो तेरा मैं जब उतारूं, जब मेरे पास कुछ अपना भी हो; तेरी मिट्टी, तेरा पानी, तेरी हवा, तेरी धूप, तेरी छांव, तेरी रोटी और नाम तेरा, फिर भी बस एक कतरा ही बन पाउं तेरा, तो मैं समझूं और तुझको मैं अपना पुकारूं।
जिंदगी जीने का अंदाज तो आया मगर अफसोस,
वो मुकम्मल एहसास नहीं आया;
वो हुनर तो आया मगर,
ऐ बदनसीबी वो मुकाम कभी नहीं आया।
यूं गलतफहमियां पाला न करो,कभी आईने में खुद को निहारा भी करो; ये जो चेहरा है वो सब कुछ बयां कर देता है; कभी इसको जुबां पर उतारा भी करो।
आशुतोष श्रीवास्तव