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YAAD NI AUNDI

har Kise nu mohobat raas nai aundi eh taan apne apne naseeb di gal hai koi bhulda ni te kise nu yaad ni aundi

har Kise nu mohobat raas nai aundi
eh taan apne apne naseeb di gal hai
koi bhulda ni te kise nu yaad ni aundi


Best Punjabi - Hindi Love Poems, Sad Poems, Shayari and English Status


Kade ta tadap mehsus hundi || sad Punjabi shayari || Punjabi status

Kaash kade ta tadap meri mehsus ohnu hundi
Ohne zehan ch vi mere layi pyar aaya hunda..!!
Kde ta oh parh paunda chehre di khamoshi nu
Kaash rondeya nu kade ohne gal laya hunda..!!

ਕਾਸ਼ ਕਦੇ ਤਾਂ ਤੜਪ ਮੇਰੀ ਮਹਿਸੂਸ ਓਹਨੂੰ ਹੁੰਦੀ
ਓਹਦੇ ਜ਼ਹਿਨ ‘ਚ ਵੀ ਮੇਰੇ ਲਈ ਪਿਆਰ ਆਇਆ ਹੁੰਦਾ..!!
ਕਦੇ ਤਾਂ ਉਹ ਪੜ੍ਹ ਪਾਉਂਦਾ ਚਿਹਰੇ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਨੂੰ
ਕਾਸ਼ ਰੋਂਦਿਆਂ ਨੂੰ ਕਦੇ ਉਹਨੇ ਗਲ ਲਾਇਆ ਹੁੰਦਾ..!!

Title: Kade ta tadap mehsus hundi || sad Punjabi shayari || Punjabi status


Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry

थी मै,शांत चित्त बहती नदी – सी
तलहटी में था कुछ जमा हुआ
कुछ बर्फ – सा ,कुछ पत्थर – सा।
शायद कुछ मरा हुआ..
कुछ अधमरा सा।
छोड़ दिया था मैंने
हर आशा व निराशा।
होंठो में मुस्कान लिए
जीवन के जंग में उलझी
कभी सुलगी,कभी सुलझी..
बस बहना सीख लिया था मैंने।
जो लगी थी चोट कभी
जो टूटा था हृदय कभी
उन दरारों को सबसे छुपा लिया था
कर्तव्यों की आड़ में।
फिर एक दिन..
हवा के झोंके के संग
ना जाने कहीं से आया
एक मनभावन चंचल तितली
था वो जरा प्यासा सा
मनमोहक प्यारा सा।
खुशबूओं और पुष्पों
की दुनिया छोड़
सारी असमानताओं और
बंधनों को तोड़
सहमी – बहती नदी को
खुलकर बहना सीखा गया,
अपने प्रेम की गरमी से
बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया।
पाकर विश्वास कोमल भावों से जोड़े नाते का
सारी दबी अपेक्षाएं हो गई फिर जीवंत
लेकिन क्या पता था –
होगा इसका भी एक दिन अंत !
तितली को आयी अपनों की याद
मुड़ चला बगिया की ओर
सह ना सकी ये देख नदी
ये बिछड़न ये एकाकीपन
रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें
दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी
सिसक सिसक कर उसे बतलाई।
नहीं सुनना था उसे,
नहीं सुन पाया वो।
नहीं रुकना था उसे,
नहीं रुक पाया वो।
तेज उफान आया नदी में,
क्रोध और अवसाद
छाया मन में,
फिर छला था
नेह जता कर किसी ने।
आवाज देती..लहरें,
उठती और गिरती
किनारों से टकराती,
हो गई घायल।
बीत गए असंख्य क्षण
उसकी वापसी की आस में
लेकिन सामने था, तो सिर्फ शून्य।
हो गई नदी फिर से मौन..
छा गई निरवता।
लेकिन अबकी बार,
नहीं जमा कुछ तलहटी में
कुछ बर्फ सा,
कुछ पत्थर सा।
बस रह गया भीतर
रक्तिम हृदय..
और लाल रक्त।
जो रिस रिस कर
घुलता जा रहा है
मिलता जा रहा है
अपने ही बेरंग पानी में…।।

Title: Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry