Munasib lage to humein apni yaadon mein samet lena
Karazdaar rahe hum aapke, mukammal yaari esi nibha lena…!
मुनासिफ़ लगे तो हमें अपनी यादों में समेट लेना…
कर्ज़दार रहें हम आपके, मुक़म्मल यारी ऐसी निभा लेना…!
Munasib lage to humein apni yaadon mein samet lena
Karazdaar rahe hum aapke, mukammal yaari esi nibha lena…!
मुनासिफ़ लगे तो हमें अपनी यादों में समेट लेना…
कर्ज़दार रहें हम आपके, मुक़म्मल यारी ऐसी निभा लेना…!
अकबर बादशाह को मजाक करने की आदत थी। एक दिन उन्होंने नगर के सेठों से कहा-
“आज से तुम लोगों को पहरेदारी करनी पड़ेगी।”
सुनकर सेठ घबरा गए और बीरबल के पास पहुँचकर अपनी फरियाद रखी।
बीरबल ने उन्हें हिम्मत बँधायी,
“तुम सब अपनी पगड़ियों को पैर में और पायजामों को सिर पर लपेटकर रात्रि के समय में नगर में चिल्ला-चिल्लाकर कहते फिरो, अब तो आन पड़ी है।”
उधर बादशाह भी भेष बदलकर नगर में गश्त लगाने निकले। सेठों का यह निराला स्वांग देखकर बादशाह पहले तो हँसे, फिर बोले-“यह सब क्या है ?”
सेठों के मुखिया ने कहा-
“जहाँपनाह, हम सेठ जन्म से गुड़ और तेल बेचने का काम सीखकर आए हैं, भला पहरेदीर क्या कर पाएँगे, अगर इतना ही जानते होते तो लोग हमें बनिया कहकर क्यों पुकारते?”
बादशाह अकबर बीरबल की चाल समझ गए और अपना हुक्म वापस ले लिया।
हिम्मत भी है ताकत भी ओर हौसला भी
उनकी खुशी के लिए सब कुछ कर जाऊंगा
देखेगी दुनिया भी इस अंजान चेहरे को
जब बाहों में समेटकर में चांद लेकर आऊंगा
मेरी मां के चेहरे पर मुस्कुराहट होगी
और हाथो मेरे लिए में नूर होगा
हवाओं में भी खुशबू होगी और
पापा की नज़रों में गुरूर होगा
सुरूर होगा जब दुनिया अपनी सी लगेगी
जब दुनिया को मेरा भी शउर होगा
अपनी नज़रों में तालाब की आवाम भर लाऊंगा
हर शाम में लौट कर जब घर आऊंगा
हाथों में रोटी पकड़कर कहेगी, बेटा खा ले
मैं मुस्कुराकर दो निवाले उसे भी खिलाऊंगा
खैर, निकल पड़ा हूं अभी मंज़िल ढूंढने खुद ही
इंतेज़ार उस वक्त का है जब मै चांद समेट लाऊंगा...