इस ग़म के सवेरे में अजीब सा साया है,
दरवाज़े पर मेरे इक फकीर आया है,
उसे भूख है, मुझे अंधेरों ने खाया है,
जो था सब उसे नज़र कैसे ना करता,
वो मेरे लिए मुट्ठी भर रौशनी लाया है…🍂
इस ग़म के सवेरे में अजीब सा साया है,
दरवाज़े पर मेरे इक फकीर आया है,
उसे भूख है, मुझे अंधेरों ने खाया है,
जो था सब उसे नज़र कैसे ना करता,
वो मेरे लिए मुट्ठी भर रौशनी लाया है…🍂

एक दिन जिंदगी ऐसे मुकाम पर पहुँच जाएँगी
दोस्ती तो सिर्फ़ यादों में ही रह जाएँगी
हर बात दोस्तों की याद दिलायेंगी
और हँसते हँसते फिर आँख नम हो जाएँगी
ऑफिस के रूम में क्लासरूम नज़र आएँगी
पैसे तो बहोत होगा
लेकिन खर्चा करने के लम्हें कम हो जायेंगें
जी लेंगे खुल के इस पल को मेरे दोस्त
क्यूँ के जिंदगी इस पल को फिर से नहीँ दोहराएँगी