*लखनऊ* की शाम थी, पर *तन्हा* थे हम ।
*मुमकिन* होता तुम मेरे होते तो *साथ* होते हम ।।
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*लखनऊ* की शाम थी, पर *तन्हा* थे हम ।
*मुमकिन* होता तुम मेरे होते तो *साथ* होते हम ।।
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“थोड़ा थक सा जाता हूं अब मै…
इसलिए, दूर निकलना छोड़ दिया है,
पर ऐसा भी नही हैं कि अब…
मैंने चलना ही छोड़ दिया है।
फासलें अक्सर रिश्तों में…
अजीब सी दूरियां बढ़ा देते हैं,
पर ऐसा भी नही हैं कि अब मैंने..
अपनों से मिलना ही छोड़ दिया है।
हाँ जरा सा अकेला महसूस करता हूँ…
खुद को अपनों की ही भीड़ में,
पर ऐसा भी नहीं है कि अब मैंने…
अपनापन ही छोड़ दिया है।
याद तो करता हूँ मैं सभी को… और परवाह भी करता हूँ सब की, पर कितनी करता हूँ… बस, बताना छोड़ दिया है।।”
Aksar tere takk aa ke mukki janda e
Kise manzil di khwahish ch meriyan socha da safar..!!
ਅਕਸਰ ਤੇਰੇ ਤੱਕ ਆ ਕੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦਾ ਏ
ਕਿਸੇ ਮੰਜ਼ਿਲ ਦੀ ਖੁਆਹਿਸ਼ ‘ਚ ਮੇਰੀਆਂ ਸੋਚਾਂ ਦਾ ਸਫ਼ਰ..!!