
na kujh nafa na totta leeta, darad dukha di gathrri bhari
lai bedardaa sang yaari

ईद के ख़ास मौक़े पर कोई ख़ुदाई से मिले,
दुश्मन – दुश्मन से मिले भाई – भाई से मिले
दुनियां वालों तुम्हें क्यों जलन होती है अग़र,
मुस्लिम सीख़ से मिले या सीख़ ईसाई से मिले
उस बंटवारे को अल्लाह भी क़बूल नहीं कर्ता,
जो हिस्सा इंसानों को ख़ून की लड़ाई से मिले
ग़ले ज़रूर मिलो मग़र ग़ला काटने के लिए नहीं,
क़ल को क्या पता किसका वक़्त जा बुराई से मिले
ये शायर तेरा आशिक़ है एक ही बात कहता है
हमसे जब भी जो भी मिले दिल की गहराई से मिले
Na sochiyega
Kabhi aapki fikar krenge kisi se aapka zikar krenge zikar kya juban par naam nhi ykeen maniye isse badhkar koi intkaam nhi
न सोचिएगा
कभी आप की फिक्र करेंगे किसी से आपका ज़िक्र करेंगे ज़िक्र क्या जुबां पर नाम नही यकीन मानिए इस से बढ़ कर इंतकाम नही