MANZIL HAI DUR BAHUT
KOSHISH MAGAR KAR TO SAHI
MANA MUSHKIL HAI SAFAR
EK KADAM CHAL KE DEKH TO SAHI
– AMRUTA
MANZIL HAI DUR BAHUT
KOSHISH MAGAR KAR TO SAHI
MANA MUSHKIL HAI SAFAR
EK KADAM CHAL KE DEKH TO SAHI
– AMRUTA
Maan liya tha jise khuda se upar,
Na milne par uske shikayat ab khuda se kyu!
मान लिया था जिसे खुदा से भी ऊपर,
न मिलने पर उसके शिकायत अब खुदा से क्यों !
मरहम घाव ढूंढ रहे हैं, पत्ते छांव ढूंढ रहे हैं,
मंजिलें थोड़ी दूर हैं, रास्ते पांव ढूंढ रहे हैं...
गुमराह करने वालों की भीड़ बहुत बड़ी है
वहां मत जाना वो चलने को बस दाव ढूंढ रहे हैं...
बेच देंगे वो सरकारें भी इक दिन
मिलने का सही भाव ढूंढ रहे हैं...
बेगुनाहों को बेजान करना आदत है इनकी
बस, मूंछों को देने के लिए झूठा ताव ढूंढ रहे
हैं...