इक तरफ ज़मीं से आसमां छूने को जी करता है,
इक तरफ होंठों से ज़मीं चूमने को जी करता है...
इन चार दीवारों की सरहदें भी तो मुक्कमल है,
शाम होते ही दोनों जहां घूमने को जी करता है...
इक तरफ ज़मीं से आसमां छूने को जी करता है,
इक तरफ होंठों से ज़मीं चूमने को जी करता है...
इन चार दीवारों की सरहदें भी तो मुक्कमल है,
शाम होते ही दोनों जहां घूमने को जी करता है...
Likhu…
Toh “lafz” tum ho …
Sochu….
Toh “khayaal” tum ho…
Maangu….
Toh “dua” tum ho…
Sach kahu..
Toh “mohobbat” tum ho…. 😘🥰🥰
लिखूँ…
तो “लफ्ज़” तुम हो…
सोचूँ…
तो “खयाल” तुम हो…
माँगू…
तो “दुआ” तुम हो…
सच कहूँ…
तो “मोहोब्बत” तुम हो…😘🥰🥰
