इक इश्तहार छपा है अखबार में,
खुली सांसे भी बिकने लगी बाज़ार में,
रूह भी निचोड़ ली उसकी,
काट दी ज़बान बेगुनाह की,
मसला कुछ ज़रूरी नहीं,
बस थोड़ी बहस चलती है सरकार में...
इक इश्तहार छपा है अखबार में,
खुली सांसे भी बिकने लगी बाज़ार में,
रूह भी निचोड़ ली उसकी,
काट दी ज़बान बेगुनाह की,
मसला कुछ ज़रूरी नहीं,
बस थोड़ी बहस चलती है सरकार में...
Tu Rabb di diti hoi saugaat e mere lai
tere pyaar da mool be-hisaab mere lai
jo vaar sakaa tere ton kujh ajeha ni mere kol
ik jaan hai begaani oh v kurbaan tere ton ||
ਤੂੰ ਰੱਬ ਦੀ ਦਿੱਤੀ ਹੋਈ ਸੌਗਾਤ ਏ ਮੇਰੇ ਲਈ
ਤੇਰੇ ਪਿਆਰ ਦਾ ਮੂਲ ਬੇ-ਹਿਸਾਬ ਮੇਰੇ ਲਈ
ਜੋ ਵਾਰ ਸਕਾ ਤੇਰੇ ਤੋਂ ਕੁਝ ਅਜਿਹਾ ਨੀ ਮੇਰੇ ਕੋਲ,
ਇਕ ਜਾਨ ਹੈ ਬੇਗਾਨੀ ਉਹ ਵੀ ਕੁਰਬਾਨ ਤੇਰੇ ਤੋ||
“सोचता हूँ, के कमी रह गई शायद कुछ या
जितना था वो काफी ना था,
नहीं समझ पाया तो समझा दिया होता
या जितना समझ पाया वो काफी ना था,
शिकायत थी तुम्हारी के तुम जताते नहीं
प्यार है तो कभी जमाने को बताते क्यों नहीं,
अरे मुह्हबत की क्या मैं नुमाईश करता
मेरे आँखों में जितना तुम्हें नजर आया,
क्या वो काफी नहीं था I
सोचता हूँ के क्या कमी रह गई,
क्या जितना था वो काफी नहीं था
“सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
उनके मुँह से निकले सारे अल्फाजों को याद कर लूँ कभी I
ऐसी क्या मज़बूरी होगी उनकी की हम याद नहीं आते I
सोचता हूँ तोहफा भेज कर अपनी याद दिला दूँ कभी I
सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I