इक इश्तहार छपा है अखबार में,
खुली सांसे भी बिकने लगी बाज़ार में,
रूह भी निचोड़ ली उसकी,
काट दी ज़बान बेगुनाह की,
मसला कुछ ज़रूरी नहीं,
बस थोड़ी बहस चलती है सरकार में...
इक इश्तहार छपा है अखबार में,
खुली सांसे भी बिकने लगी बाज़ार में,
रूह भी निचोड़ ली उसकी,
काट दी ज़बान बेगुनाह की,
मसला कुछ ज़रूरी नहीं,
बस थोड़ी बहस चलती है सरकार में...
Munasib lage to humein apni yaadon mein samet lena
Karazdaar rahe hum aapke, mukammal yaari esi nibha lena…!
मुनासिफ़ लगे तो हमें अपनी यादों में समेट लेना…
कर्ज़दार रहें हम आपके, मुक़म्मल यारी ऐसी निभा लेना…!
