इक इश्तहार छपा है अखबार में,
खुली सांसे भी बिकने लगी बाज़ार में,
रूह भी निचोड़ ली उसकी,
काट दी ज़बान बेगुनाह की,
मसला कुछ ज़रूरी नहीं,
बस थोड़ी बहस चलती है सरकार में...
इक इश्तहार छपा है अखबार में,
खुली सांसे भी बिकने लगी बाज़ार में,
रूह भी निचोड़ ली उसकी,
काट दी ज़बान बेगुनाह की,
मसला कुछ ज़रूरी नहीं,
बस थोड़ी बहस चलती है सरकार में...
Kinni nazdeek e tu mere kinj dassa mein tenu
Tu taa saahan ch ghuleya hoyia mehsus howe menu..!!
ਕਿੰਨੀ ਨਜ਼ਦੀਕ ਏ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਕਿੰਝ ਦੱਸਾਂ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ
ਤੂੰ ਤਾਂ ਸਾਹਾਂ ‘ਚ ਘੁਲਿਆ ਹੋਇਆ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋਵੇ ਮੈਨੂੰ..!!
खूबसूरत तो हर लम्हा है,
शायद देखने की नज़ाकत नहीं है...
अकेले चलने की हिम्मत तो है,
शायद साथ छोड़ने की आदत नहीं है...
शर्त है मै सिर्फ मयखाने तक जाऊंगा
आगे का रास्ता तुम तय कर लेना...
ताल्लुक़ मेरा पुराना है इन गलियों से,
शायद छूटा पैमाना पकड़ने की आदत नहीं है...