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Kabhi teji rakhu || hindi shayari

कभी तेजी रखू, सफर में कभी मैं, ढलने लगता हूं..
कभी ठहर जाऊ, एक जगह कभी बस, चलने लगता हूं..
मंजिल का अता और पता नहीं, फासला सफर का जरा बढ़ गया..
सोच कर कमाई बस, सफर की हथेलियों को, मालने लगता हूं..

Title: Kabhi teji rakhu || hindi shayari

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मरहम घाव ढूंढ रहे हैं || marham ghaw doodh rahe hai || dard hindi shayari

मरहम घाव ढूंढ रहे हैं, पत्ते छांव ढूंढ रहे हैं,
मंजिलें थोड़ी दूर हैं, रास्ते पांव ढूंढ रहे हैं...
गुमराह करने वालों की भीड़ बहुत बड़ी है
वहां मत जाना वो चलने को बस दाव ढूंढ रहे हैं...
बेच देंगे वो सरकारें भी इक दिन
मिलने का सही भाव ढूंढ रहे हैं...
बेगुनाहों को बेजान करना आदत है इनकी
बस, मूंछों को देने के लिए झूठा ताव ढूंढ रहे
हैं...

Title: मरहम घाव ढूंढ रहे हैं || marham ghaw doodh rahe hai || dard hindi shayari