कभी तेजी रखू, सफर में कभी मैं, ढलने लगता हूं..
कभी ठहर जाऊ, एक जगह कभी बस, चलने लगता हूं..
मंजिल का अता और पता नहीं, फासला सफर का जरा बढ़ गया..
सोच कर कमाई बस, सफर की हथेलियों को, मालने लगता हूं..
कभी तेजी रखू, सफर में कभी मैं, ढलने लगता हूं..
कभी ठहर जाऊ, एक जगह कभी बस, चलने लगता हूं..
मंजिल का अता और पता नहीं, फासला सफर का जरा बढ़ गया..
सोच कर कमाई बस, सफर की हथेलियों को, मालने लगता हूं..
मूक प्राणियों पर हमको तो,
तरस बहुत ही आता है।
इनकी देख दुर्दशा अपना,
सीना फटता जाता है।।
वन्य जीव जितने भी हैं,
सबका अस्तित्व बचाना है,
जंगल के जीवों के ऊपर,
दया हमें दिखलाना है।
वृक्ष अमूल्य धरोहर हैं,
इनकी रक्षा करना होगा।
जीवन जीने की खातिर,
वन को जीवित रखना होगा।
तनिक-क्षणिक लालच को,
अपने मन से दूर भगाना है।
धरती का सौन्दर्य धरा पर,
हमको वापिस लाना है।।
है इश्क तो फिर असर भी होगा,
जितना है इधर उधर भी होगा ।
मिल नहीं पाता तो क्या हुआ,
मोहब्बत तो तुमसे फिर भी बेहिसाब करता हूं ।