कई दिनो से अपने तकिए के भिगोये नही हूं,
एक मुद्त गुझर गई जी भर के रोया नही हूं
पता नही अब वोक नींद कब मिलेगी
कई रातो से मीठे ख्वाबो मे खोया नही हुं
कई दिनो से अपने तकिए के भिगोये नही हूं,
एक मुद्त गुझर गई जी भर के रोया नही हूं
पता नही अब वोक नींद कब मिलेगी
कई रातो से मीठे ख्वाबो मे खोया नही हुं
हटा ली आइने से धूल ए ग़ालिब,
अब दामन मैला सा लगता है,
रूह तो नापाक थी ही,
अब आंगन भी मैला सा लगता है,
देखना ज़रूर के परिंदे भी छोड़ जायेंगे
बसेरा अपना उस दर से,
जिस दर पर मोहब्बत का मेला भी,
मैला सा लगता है...
चल दिया तेरे साथ, मेरा तख्त ओ ताज छूट गया,
वो रात के इंतजार में थे, सूरज फिर ऊग गया,
दर्द देते है रास्ते भी, दिल न लगाना उनसे,
रोज़ अपना दुख पीते पीते ये गला सूख गया,
सांसे भी नम है,
प्यास बुझालो क्यू आंखो में समंदर छुपा बैठे हो,
तुम भी धड़कनों का जनाजा कांधे पर लिए बैठे हो...