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Kehndi kanaal hi aa palle tere

ਕਹਿੰਦੀ ਕਨਾਲ ਹੀ ਆ ਪੱਲੇ ਤੇਰੇ

ਤੂੰ ਰੀਝਾਂ ਮੇਰੀਆਂ ਪੁਗਾ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ

ਮੇਰਾ ਸੁਪਨਾ ਏ ਕਨੇਡਾ ਜਾਣਾ

ਤੂੰ ਸ਼ਿਮਲੇ ਤਕ ਦਾ ਖ਼ਰਚਾ ਲਾ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ

ਕਹਿੰਦੀ ਮੇਰਾ ਬਾਪੂ ਆੜਤੀਆ, ਸਾਡੇ ਮੂਹਰੇ ਤੇਰੀ ਕੋਈ ਔਕਾਤ ਨਹੀਂ

ਇਕ ਤਾਂ ਤੂੰ ਘੱਟ ਪੜ੍ਹਿਆ ਲਿਖਿਆ

ਉੱਤੋਂ ਸਾਡੇ ਬਰਾਬਰ ਤੂੰ ਕਮਾ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ

ਮੈਂ ਕਿਹਾ ਭਾਵੇਂ ਗੁਜਾਰੇ ਜੋਗਾ ਦਿੱਤਾ ਰੱਬ ਨੇ

ਰੋਟੀ ਟੁੱਕ ਚੰਗਾ ਚਲਦਾ ਏ

ਮੰਨਿਆ ਤੁਹਾਡੀ ਆਮਦਨ ਜਿਆਦੀ ਆ

ਪਰਿਵਾਰ ਸਾਡਾ ਵੀ ਵਧੀਆ ਵੱਸਦਾ ਏ

ਸਕੂਨ ਦੀ ਰੋਟੀ ਖਾ ਕੇ ਖੁਸ਼ ਆ

ਸਾਥੋਂ ਦੋ ਨੰਬਰ ਵਿਚ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ

ਗ਼ਰੀਬਾਂ ਦਾ ਲਹੂ ਨਚੋੜਣ ਵਾਲੇ, ਅਖ਼ੀਰ ਨੂੰ ਰੋਂਦੇ ਨੇ ਹੁੰਦੇ

Title: Kehndi kanaal hi aa palle tere

Best Punjabi - Hindi Love Poems, Sad Poems, Shayari and English Status


Ik oh c shaheed || punjabi lines on a shaheed

Jo waqat da si faisla
kar gya si poora jo si karam
naseeyat diyaa chadh paurriyaa
oh ban saboot e vazood gyaa c
na si maut da koi bharam usnu
jo kar hausla gya c
kadh dhadheya de bhulekheaa nu
sdaa rakhu yaad kom da har basishda
kite kaul poore jaswant singh khaldha de nu

ਜੋ ਵਕ਼ਤ ਦਾ ਸੀ ਫੈਸਲਾ,
ਕਰ ਗਿਆ ਸੀ ਪੂਰਾ ਜੋ ਸੀ ਕਰਮ,
ਨਸੀਅਤ ਦੀਆਂ ਚੜ੍ਹ ਪੌੜੀਆਂ,
ਉਹ ਬਣ ਸਬੂਤ ਏ ਵਜੂਦ ਗਿਆ ਸੀ,
ਨਾ ਸੀ ਮੌਤ ਦਾ ਕੋਈ ਭਰਮ ਉਸਨੂੰ,
ਜੋ ਉਹ ਕਰ ਹੌਸਲਾ ਗਿਆ ਸੀ,
ਕਢ ਢਾਡਿਆ ਦੇ ਭੁਲੇਖਿਆਂ ਨੂੰ,
ਸਦਾ ਰੱਖੂ ਯਾਦ ਕੌਮ ਦਾ ਹਰ ਬਸਿਸ਼ਦਾ,
ਕੀਤੇ ਕੌਲ ਪੂਰੇ ਜਸਵੰਤ ਸਿੰਘ ਖਾਲੜਾ ਦੇ ਨੂੰ

Title: Ik oh c shaheed || punjabi lines on a shaheed


Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry

थी मै,शांत चित्त बहती नदी – सी
तलहटी में था कुछ जमा हुआ
कुछ बर्फ – सा ,कुछ पत्थर – सा।
शायद कुछ मरा हुआ..
कुछ अधमरा सा।
छोड़ दिया था मैंने
हर आशा व निराशा।
होंठो में मुस्कान लिए
जीवन के जंग में उलझी
कभी सुलगी,कभी सुलझी..
बस बहना सीख लिया था मैंने।
जो लगी थी चोट कभी
जो टूटा था हृदय कभी
उन दरारों को सबसे छुपा लिया था
कर्तव्यों की आड़ में।
फिर एक दिन..
हवा के झोंके के संग
ना जाने कहीं से आया
एक मनभावन चंचल तितली
था वो जरा प्यासा सा
मनमोहक प्यारा सा।
खुशबूओं और पुष्पों
की दुनिया छोड़
सारी असमानताओं और
बंधनों को तोड़
सहमी – बहती नदी को
खुलकर बहना सीखा गया,
अपने प्रेम की गरमी से
बर्फ क्या पत्थर भी पिघला गया।
पाकर विश्वास कोमल भावों से जोड़े नाते का
सारी दबी अपेक्षाएं हो गई फिर जीवंत
लेकिन क्या पता था –
होगा इसका भी एक दिन अंत !
तितली को आयी अपनों की याद
मुड़ चला बगिया की ओर
सह ना सकी ये देख नदी
ये बिछड़न ये एकाकीपन
रोयी , गिड़गिड़ाई ..की मिन्नतें
दर्द दुबारा ये सह न पाऊंगी
सिसक सिसक कर उसे बतलाई।
नहीं सुनना था उसे,
नहीं सुन पाया वो।
नहीं रुकना था उसे,
नहीं रुक पाया वो।
तेज उफान आया नदी में,
क्रोध और अवसाद
छाया मन में,
फिर छला था
नेह जता कर किसी ने।
आवाज देती..लहरें,
उठती और गिरती
किनारों से टकराती,
हो गई घायल।
बीत गए असंख्य क्षण
उसकी वापसी की आस में
लेकिन सामने था, तो सिर्फ शून्य।
हो गई नदी फिर से मौन..
छा गई निरवता।
लेकिन अबकी बार,
नहीं जमा कुछ तलहटी में
कुछ बर्फ सा,
कुछ पत्थर सा।
बस रह गया भीतर
रक्तिम हृदय..
और लाल रक्त।
जो रिस रिस कर
घुलता जा रहा है
मिलता जा रहा है
अपने ही बेरंग पानी में…।।

Title: Hindi kavita || बहती नदी – सी || hindi poetry