किताब, फ़िल्म, सफ़र इश्क़, शायरी, औरत
कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढता हुआ
कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढता हुआ
अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर
Oh har saah naal chete aundi e
saannu hasdeyaa nu ikalla kar jandi
preet kaash rooh ton kardi pyaar mere naal
te oh umraa lai mere naal khad jandi
ਉਹ ਹਰ ਸਾਹ ਨਾਲ ਚੇਤੇ ਆਉਦੀ ਏ
ਸਾਨੂੰ ਹੱਸਦਿਆ ਨੂੰ ਇਕੱਲਾ ਕਰ ਜਾਂਦੀ
ਪ੍ਰੀਤ ਕਾਸ਼ ਰੂਹ ਤੋਂ ਕਰਦੀ ਪਿਆਰ ਮੇਰੇ ਨਾਲ
ਤੇ ਉਹ ਉਮਰਾਂ ਲਈ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਖੜ ਜਾਂਦੀ
ਭਾਈ ਰੂਪਾ
जो दर्द छुपा था सहमी सी आँखों में उसकी, वक़्त लगा पर दिख गया..
उसे भी शायद कोई गम था ऐसा, जो बेरहम इस जमाने से झिक गया..
आँखें मूंदी कई बार तो उसने, शायद गम को कहीं वो छुपा सके..
मगर हर आंसू जो उसकी आंखों से बहा, अपने हर दर्द की दास्तां लिख गया..