When ever you hear someone reading lines which I wrote once, I hope it reminds you of me.
When ever you hear someone reading lines which I wrote once, I hope it reminds you of me.
ख़िज़ाँ का दौर हो या हो बहार का मौसम
मेरे लिए नहीं कोई क़रार का मौसम
किसे ख़बर थी बिछड़कर न मिल सकेंगे कभी
न ख़त्म होगा तेरे इन्तिज़ार का मौसम
ग़रज़ का दौर है सबको हैं अपनी अपनी धुन
किसी को रास न आया पुकार का मौसम
ढला है हुस्न तो मशहूर बेवफ़ाई हुई
गुज़र गया है तेरे इन्तिज़ार का मौसम
उड़ाए फिरती है आवारगी की आंधी हमें
हमें नसीब कहाँ ज़ुल्फ़-ए- यार का मौसम
बुझे हैं रेख़्ता हम तो बुझे नज़ारे हैं
उदास उदास लगा हुस्न -ए- यार का मौसम
Neend ton koi shikwa nai
jo aundi ni raat bhar
kasoor tan us chehre da
jo saun ni dinda raat bhar
ਨੀਂਦ ਤੋਂ ਕੋਈ ਸ਼ਿਕਵਾ ਨਹੀਂ
ਜੋ ਆਉਂਦੀ ਨੀ ਰਾਤ ਭਰ
ਕਸੂਰ ਤਾਂ ਉਸ ਚਹਿਰੇ ਦਾ
ਜੋ ਸੌਣ ਨਈ ਦਿੰਦਾ