Loki puchhde ne aksar
ki karda haan me
ki dassan me ohna nu
roj parda han me ohnu
roj likhda han me ohnu
ਲੋਕੀ ਪੁਛਦੇ ਨੇ ਅਕਸਰ
ਕੀ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ
ਕੀ ਦੱਸਾਂ ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ
ਰੋਜ਼ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ
ਰੋਜ਼ ਲਿਖਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ
Loki puchhde ne aksar
ki karda haan me
ki dassan me ohna nu
roj parda han me ohnu
roj likhda han me ohnu
ਲੋਕੀ ਪੁਛਦੇ ਨੇ ਅਕਸਰ
ਕੀ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ
ਕੀ ਦੱਸਾਂ ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ
ਰੋਜ਼ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ
ਰੋਜ਼ ਲਿਖਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ ਉਹਨੂੰ
“सोचता हूँ, के कमी रह गई शायद कुछ या
जितना था वो काफी ना था,
नहीं समझ पाया तो समझा दिया होता
या जितना समझ पाया वो काफी ना था,
शिकायत थी तुम्हारी के तुम जताते नहीं
प्यार है तो कभी जमाने को बताते क्यों नहीं,
अरे मुह्हबत की क्या मैं नुमाईश करता
मेरे आँखों में जितना तुम्हें नजर आया,
क्या वो काफी नहीं था I
सोचता हूँ के क्या कमी रह गई,
क्या जितना था वो काफी नहीं था
“सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
उनके मुँह से निकले सारे अल्फाजों को याद कर लूँ कभी I
ऐसी क्या मज़बूरी होगी उनकी की हम याद नहीं आते I
सोचता हूँ तोहफा भेज कर अपनी याद दिला दूँ कभी I
सोचता हूँ कभी पन्नों पर उतार लूँ उन्हें I
Muskurahat ke peechhe ka raaz tum ho,
jo padhti hu roz woh nwaaz tum ho,
gungunati hu jo main khud likh kar,
uske peechhe ki jaan meri awaaz tum ho…..