जाते जाते एक उम्दा तालीम दे गया, वो मुसाफिर, खुदकी तलाश में घर से निकल गया, वो मुसाफिर, सोचा साथ जाऊं मैं भी, पर जाऊंगा कहां, जा चुका होगा मीलों दूर, उसे पाऊंगा कहां, इसी सोच में रात हुई, नींद का झोंका आ गया, सुबह आंखे खुली तो सोचा, क्या वो मौका आज आ गया ? के चला जाऊं सबसे इतना दूर के कुछ ना हो, गहरी नींद में बेड़ियां मिले पर सचमुच ना हो, सच हो तो बस आसमां में परिंदो सी उड़ान हो, चाहूंगा हर सितमगर का बड़ा सा मकान हो, वहां आवाज़ देकर झोली फैलाएगा वो मुसाफिर, तुम्हे देख भीगी पलकें उठाएगा वो मुसाफिर, मोहब्बत से एक रोटी खिलाकर देखना तुम, शोहरत से दामन भर जाएगा वो मुसाफिर...
Kade asi lakha vicho ik si
hun kakhaa vich haa sajjna
par jinna chir ne saah mere chalde
tainu rakhaange rabb di thaa te sajjna
ਕਦੇ ਅਸੀ ਲੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ
ਹੁਣ ਕੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਹਾਂ ਸੱਜਣਾ
ਪਰ ਜਿੰਨਾਂ ਚਿਰ ਨੇ ਸਾਹ ਮੇਰੇ ਚੱਲਦੇ
ਤੈਨੂੰ ਰੱਖਾਗੇ ਰੱਬ ਦੀ ਥਾਂ ਤੇ ਸੱਜਣਾ