
Maarne ki liye to unki ek nazar hi kaafi thi..!!

महर-ओ- वफ़ा की शमआ जलाते तो बात थी
इंसानियत का पास निभाते तो बात थी
जम्हूरियत की शान बढ़ाते तो बात थी
फ़िरक़ा परस्तियों को मिटाते तो बात थी
जिससे कि दूर होतीं कुदूरत की ज़ुल्मतें
ऐसा कोई चराग़ जलाते तो बात थी
जम्हूरियत का जश्न मुबारक तो है मगर
जम्हूरियत की जान बचाते तो बात थी
ज़रदार से यह हाथ मिलाना बजा मगर
नादार को गले से लगाते तो बात थी
बर्बाद होने का तो कोई ग़म नहीं मगर
अपना बनाके मुझको मिटाते तो बात थी
हिंदुस्तान की क़सम ऐ रेख़्ता हूँ ख़ुश
पर मुंसिफ़ी की बात बताते तो बात थी
Irada na tha mera door jane ka
Gairon se fariyaad na kar mere laut aane ka
Mohobbat ke lamhe bhool nhi sakte
Koi to esa zariya hota yaadon ko bhool jane ka…
इरादा न था मेरा दुर जाने का
गैरो से फ़रियाद न कर मेरे लौट आने का ।
मोहब्बत के लम्हे भूल नही सकते
कोई तो ऐसा जरिया होता यादो को भूल जाने का ।।