ਵਕ਼ਤ ਬਦਲਾਂ ਸਭ ਬਦਲੇ ਬਦਲ ਗਏ ਲ਼ੋਕ
ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਟੁੱਟੇ ਹੋਏ ਸੀ
ਜੇ ਅੱਜ ਟੁੱਟ ਗਏ ਫੇਰ ਕਾਹਦਾ ਕਿਤਾ ਜਾਵੇ ਸ਼ੋਕ
—ਗੁਰੂ ਗਾਬਾ 🌷
ਵਕ਼ਤ ਬਦਲਾਂ ਸਭ ਬਦਲੇ ਬਦਲ ਗਏ ਲ਼ੋਕ
ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਟੁੱਟੇ ਹੋਏ ਸੀ
ਜੇ ਅੱਜ ਟੁੱਟ ਗਏ ਫੇਰ ਕਾਹਦਾ ਕਿਤਾ ਜਾਵੇ ਸ਼ੋਕ
—ਗੁਰੂ ਗਾਬਾ 🌷
लिखता मैं किसान के लिए
मैं लिखता इंसान के लिए
नहीं लिखता धनवान के लिए
नहीं लिखता मैं भगवान के लिए
लिखता खेत खलियान के लिए
लिखता मैं किसान के लिए
नहीं लिखता उद्योगों के लिए
नहीं लिखता ऊँचे मकान के लिए
लिखता हूँ सड़कों के लिए
लिखता मैं इंसान के लिए
क़लम मेरी बदलाव बड़े नहीं लाई
नहीं उम्मीद इसकी मुझे
खेत खलियान में बीज ये बो दे
सड़क का एक गढ्ढा भर देती
ये काफ़ी इंसान के लिए
लिखता हूँ किसान के लिए
लिखता मैं इंसान के लिए
आशा नहीं मुझे जगत पढ़े
पर जगत का एक पथिक पढ़े
फिर लाए क्रांति इस समाज के लिए
इसलिए लिखता मैं दबे-कुचलों के लिए
पिछड़े भारत से ज़्यादा
भूखे भारत से डरता हूँ
फिर हरित क्रांति पर लिखता हूँ
फिर किसान पर लिखता हूँ
क्योंकि
लिखता मैं किसान के लिए
लिखता मै इंसान के लिए
तरुण चौधरी
हमने जो की थी मोहब्बत आज भी है
उनके ज़ुल्फ़ों की शाए की चाहत आज भी है
ये रात कटती है आज भी ख्याल में उनके
दीवानों सी वो मेरी हालत आज भी है
किसी औरकी तस्वीर को उठती नहीं
बेईमान आँखों में थोड़ी सी शराफ़त आज भी है
एक बार चाह कर चाहे दिल तोड़ दे वोह
दिल तोड़ के जाने की इज़ाज़त उसे आज भी है
हमने जो की थी मोहब्बत आज भी है
उनके ज़ुल्फ़ों की शाए की चाहत आज भी है