जब पहुंचा कि जब पहुंचा मैं अपनी मौत के पास
कि जब पहुंचा कि जब पहुंचा मैं अपनी मौत के पास
खुदा बोला, कि उसकी की हुई दुआओं में कमब्ख्त बहुत दम है
इसलिए मौत तो दूर की बात, तेरी ज़िंदगी में दरद बहुत कम है
जब पहुंचा कि जब पहुंचा मैं अपनी मौत के पास
कि जब पहुंचा कि जब पहुंचा मैं अपनी मौत के पास
खुदा बोला, कि उसकी की हुई दुआओं में कमब्ख्त बहुत दम है
इसलिए मौत तो दूर की बात, तेरी ज़िंदगी में दरद बहुत कम है
अब बस लिख के मिटा हम देते हैं, अपने ही शब्दों के जाल को..
क्यूंकि अब डायरी भी समझ नहीं पाती है, मेरे मन में चलते ख्याल को..
अब पन्ने भी मेरी कलम की स्याही से, बस दूर सा होना चाहते हैं..
अब बताएं भी तो आखिर किसे बताएं, अपने इस बिगडते हाल को..
खमियाज़ा ए ज़िन्दगी हर पल मिलता है,
कोई कुछ वक्त तो कोई ज़िन्दगी भर साथ चलता है...
मैं अपनी राहों पर अब अकेले निकाल आया हूं,
जो वक्त सबका था कुछ अपने लिए लाया हूं...
शीशे की कब्र में दफ्न जैसे कोई राज़ हूं,
बरसों से अनसुना जैसे कोई साज़ हूं...
ज़िन्दगी का हाथ थाम कर अब चलने की गुज़ारिश है,
सपनों से तर आगे समंदर और बारिश है...
इक दिन समंदर और बारिश भी पार कर जाऊंगा,
सबकी नज़रें होगी मुझपे और मैं ज़िन्दगी गुलज़ार कर जाऊंगा....