
saadhe wal mukhda modh

उनके बारे में सोचूं, तो सोच में सुबह से शाम करदूँ..
मेरी दोस्ती कुबूल है उन्हें, क्या ये ज़िक्र शरेआम करदूँ..
अभी कहदूँ या रुकुं थोडा, जो मेरे दिल में बातें हैं..?
मेरा बस चले तो अपनी मुस्कान का कुछ हिस्सा, मैं उनके नाम करदूँ..
अपना हाल–ऐ–दिल बयां करने निकला तो,
वे कहने लगे एक–तरफा इश्क़ कुछ नहीं होता।
रुस्वाही समझकर,निराश भटकने लगे।।
जनाब को कोई समझाओ….
एक–तरफा इश्क़ में रोज़ दिल टूटते हैं,
आस रहती है, कभी मुड़कर हम्पें नजर पड़े उनकी,
हर रोज़ एक नई कहानी बनती है उनके साथ,
बस ख्यालों में जीते हैं……….
हमारी दास्तां….
बस ये कोरे पन्ने सुनते हैं,
डर है कि किसी रोज़ ये जलकर काले न हो जाएं।।।