कहां था ना बदल जाओगे, इस वक़्त की तरह
मगर ईतना तो, यह वक़्त भी नहीं बदला
जीतना तुम बदल गए।
कहां था ना बदल जाओगे, इस वक़्त की तरह
मगर ईतना तो, यह वक़्त भी नहीं बदला
जीतना तुम बदल गए।
हिम्मत भी है ताकत भी ओर हौसला भी
उनकी खुशी के लिए सब कुछ कर जाऊंगा
देखेगी दुनिया भी इस अंजान चेहरे को
जब बाहों में समेटकर में चांद लेकर आऊंगा
मेरी मां के चेहरे पर मुस्कुराहट होगी
और हाथो मेरे लिए में नूर होगा
हवाओं में भी खुशबू होगी और
पापा की नज़रों में गुरूर होगा
सुरूर होगा जब दुनिया अपनी सी लगेगी
जब दुनिया को मेरा भी शउर होगा
अपनी नज़रों में तालाब की आवाम भर लाऊंगा
हर शाम में लौट कर जब घर आऊंगा
हाथों में रोटी पकड़कर कहेगी, बेटा खा ले
मैं मुस्कुराकर दो निवाले उसे भी खिलाऊंगा
खैर, निकल पड़ा हूं अभी मंज़िल ढूंढने खुद ही
इंतेज़ार उस वक्त का है जब मै चांद समेट लाऊंगा...
कितने गुज़र गए ज़माने यूँ ज़ख्म खाने में,
बडा वक़्त लगाते हो यार मरहम लगाने में.
दासबर्दार तेरे इश्क़ में आशनाई गवा बैठे,
बावर्णा दिल-खवा अपने भी थे ज़माने में.
जो क़ल्ब परोसता है ग़ज़लों में बेदिली से मुसाहिब,
मुझे भी तोह सुना कोनसा ग़म है तेरे अफ़साने में.
मेरा ग़म कौन जाने मैं पौधा ही जानू हिज्र-ए-गुल,
बीस दिन लगते है अशर कली को फूल बनाने में…