किताब, फ़िल्म, सफ़र इश्क़, शायरी, औरत
कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढता हुआ
कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढता हुआ
अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर
गिरा तो फ़िर कभी,उठा ना मिला
बंदों का हुज़ूम था,खुदा ना मिला
ज़िस्म ना मिले,तो क्या हुआ यार
वो दिल से कभी, जुदा ना मिला
परिंदों के जैसा था, इश्क़ उसका
कोई वादा, कोई वास्ता ना मिला
ऐसे हुआ दिल पर,कब्ज़ा उसका
धड़कनों को भी, रास्ता ना मिला
उसके शाहपरस्त भी हैं,बादशाह
कोई भी पत्थर,तरास्ता ना मिला🍂
Tujhe bhool jau agar mere bas mein ho to
Khud ki hi kabar bnwa lu agar mere bas mein ho to
In saajo, wadiyon, fulon sabhi mein tera zikr hai
Inhe bhi mita doon agar mere bas mein ho to 🍂
तुझे भूल जाऊं अगर मेरे बस में हो तो
खुद की ही कब्र बनवा लूँ अगर मेरे बस में हो तो
इन साज़ों ,वादियों ,फूलों सभी में तेरा ज़िक्र है
इन्हे भी मिटा दूँ अगर मेरे बस में हो तो 🍂