

बंदिशों से अब कैसे खुदकी करूं हिफाज़त मैं,
सवेरे से है मोहब्बत पर, अंधेरों में रहने कि आदत है…
आफ़त है कि चिराग़ का इल्म कैसे होगा,
पता नहीं जब सवेरा होगा तो क्या होगा…
क्या होगा जो खुदसे कर लूं बगावत मै,
जीत लूं खुदको अगर हार जाऊं तो आफ़त है…
हारने का शोंक नहीं लड़ना अब रास नहीं आता,
सब कहते है मुझे तू हरकतों से बाज़ नहीं आता…
देखो, हरकतों में भी मेरी तहज़ीब और शराफत है,
जीत लेंगे दुनिया भी अगर रब की इजाज़त है… 🙃
ना हुस्न से, ना सूरत से, ना तेरी अदाओं से दिल बेचैन है…
तेरे जिस्म का घायल करने वाला हिस्सा, तो सिर्फ़ तेरे नैन हैं..
देखा जो तूने, लगा लहरों पे चलती, ठंडी हवाओं का झोंका है..
क्या समझ इस इशारे में, कुछ था, या मेरी नजरों का धोखा है..
अब ना दिन में चैन है, ना रातों को सुकून मिलता है..
क्या तुझे लगता है, के किसी रांझे से मेरा खून मिलता है..??
अब तू ही सुलझा ये गुत्थी, जो मेरे ज़हन में चल रही है..
क्या ये आग ठीक है, प्यार की, जो मेरे सीने में जल रही है..?