तहजीब, लहज़ा, अदब,
अब तो सब किताबी नज़्म है,
बाज़ार में उतर देखना ग़ालिब,
ईमान की भी कीमत लगने लगी है...
Enjoy Every Movement of life!
तहजीब, लहज़ा, अदब,
अब तो सब किताबी नज़्म है,
बाज़ार में उतर देखना ग़ालिब,
ईमान की भी कीमत लगने लगी है...
तेरी याद बडी जोरो से आई आज
तू कही मुझे बददुआ तो नही दे रही
हम ख्वाबों में आए होंगे कल रात को तेरे
तू कल रात से ही शोइ नही
कुछ बातो ने याद आके रुलाया आज
तू कही वो बाते किसे और से तो नही कर रही
Kandh nal siir la k m sochi peh gyi
mere yaar nu ohh..daadea rabba
kedhi neri ley gyi!!
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