
guzaara nahi hunda
बिन मंजिल का मुसाफिर उसे दर ब_दर भटकना पड़ा
तपती सहराव में नंगे पांव चला ही चलना पड़ा
ता_उम्र उसने खुदा का शुक्र ही अदा किया उसने
मोहब्बत का मरीज__दुआ में मौत मांगा पड़ा
माँ-बाप की उम्मीदों पर
खरा उतर गया ,
इतना आगे बढ़ा, पलटा
तो उसका साथ छुट गया।
अब फर्क नहीं पड़ता जनाब
कौन साथ है?, कौन पास है?
हजारों लोग मिले हैं मुझसे दिन में
पर वो पगली आज भी खास है।
क्या नजारा था मित्र
मैंने बर्बादी खुबसूरत देखी,
तेरे बिन मर जाऊँगी
हाय!………………
ऐसी उसकी आंखो में तड़प देखी।
दिल्लगी थी, मेरे दोस्त
कोई झूठा फसाना नहीं,
आज भी दिल कहता है
खबरदार,……………
उसके सिवा किसी से दिल लगाना नहीं।
दिल देता है हौसला, मेरे दोस्त
तभी आज भी, उसका इंतजार करूँ
कही मिल जाए दो पल के लिए
तो पगली से दिल भरके बातें करूँ।