बहुत से मौसम बदलें शायद, हमें दिल की बात बताने में..
जो प्यार दबा कर रखा है, उस प्यार को उन्हें जताने में..
क्यूं पता नहीं, क्या वक्त लगे, दिल की बात जुबां
तक लाने में..
क्या और भी दूजा है हमसा?, बेबस, लाचार जमाने में..
बहुत से मौसम बदलें शायद, हमें दिल की बात बताने में..
जो प्यार दबा कर रखा है, उस प्यार को उन्हें जताने में..
क्यूं पता नहीं, क्या वक्त लगे, दिल की बात जुबां
तक लाने में..
क्या और भी दूजा है हमसा?, बेबस, लाचार जमाने में..
ये साफ सफाई की बात नहीं, कोरोना ने लिखी खत।
इधर उधर थुकना मत।
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गंगा की गोद में चलती है नाव, मृत शरीर भी।
समय का गोद में खिलती है सभ्यता और जंगली जानवर का अँधा बिस्वास भी।
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बचपन मासूम कली।
फल बनना और बड़ा होना- काला दाग में अशुद्ध कलि।
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कीचड़ में भी कमल खिलता है।
अच्छे घर में भी बिगड़ा हुआ बच्चा पैदा होते है।
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इंसान का अकाल नहीं, इंसानियत की अकाल है।
डॉक्टर (सेवा) के अकाल नहीं, वैक्सीन (व्यवस्था) का अकाल है।
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कुत्ते समझते है के कौन इंसान और कौन जानवर है।
बो इंसान को देख के पूंछ हिलाते है और जानवर को देख के भूँकते है।
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जीविका से प्यारा है जिंदगी।
अगर साँस बंद है तो कैसे समझेंगे रोटी की कमी।
Umeed te bharosa hun karne ton dar geya e
Khaure kyu duniya to man jeha bhar geya e🙌..!!
ਉਮੀਦ ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਹੁਣ ਕਰਨੇ ਤੋਂ ਡਰ ਗਿਆ ਏ
ਖੌਰੇ ਕਿਉਂ ਦੁਨੀਆਂ ਤੋਂ ਮਨ ਜਿਹਾ ਭਰ ਗਿਆ ਏ🙌..!!