रोक ले जो हौसले मेरे, मेरी कोशिशें इतनी कम नहीं है, छोड़ दूं अपनी मंज़िल डर से तेरे, ए हवा तुझमें अभी इतना दम नहीं है, टकरा ले मुझसे गर हिम्मत है तो, मैं औरों सा नहीं, किसी से कम नहीं...
रोक ले जो हौसले मेरे, मेरी कोशिशें इतनी कम नहीं है, छोड़ दूं अपनी मंज़िल डर से तेरे, ए हवा तुझमें अभी इतना दम नहीं है, टकरा ले मुझसे गर हिम्मत है तो, मैं औरों सा नहीं, किसी से कम नहीं...
उसने छोड़ा और यूं छोड़ा अब मिलते नही है हम
तेरे बाद तेरे बारे में लिखते नही है हम
महफिलों में बैठ कर राज खोले होगे हमने
पर आज कल किसी दूसरे को दिखते नही है हम
हमने डूबते सूरज की एक शाम को अपना किरदार बदल डाला,
के उस मोहब्बत की चुभन को शायरी का नजमा दे डाला,
लोग मेरी तकरीरों पर वाह वाही दे रहे थे,
भीड़ में कुछ लोग ताली बजाकर, तो कुछ लोग अपनी नाकाम मोहब्बत की दलील दे रहे थे।
महफिल के शोर से एक जानी पहचानी सी आवाज आई,
तू आज भी आगे नहीं बढ़ा की उसने गुहार लगाई,
उसकी इस शिकायत में परवान था पुराने यारो का ।
मै हैरान था कौन था यह शक्स
अनजानों की भीड़ में जिसने मेरे शब्दो में छुपी नाकाम मोहब्बत को पहचाना था,
मुस्कुराता हुआ सामने आया तब समझ आया अरे यह तो यार पुराना था।