कितना हारा होगा हमारा दिल
जब किसे ने सवारा होगा तुम्हारा दिल
टुकड़े इतने की गिन नही पाओ गी
टाके इतने की सिल नही पाओ गी
मेरी इस हालत पे भी मुंह मोड़ लिया
क्या प्थर हो गया है तुम्हारा दिल
कितना हारा होगा हमारा दिल
जब किसे ने सवारा होगा तुम्हारा दिल
टुकड़े इतने की गिन नही पाओ गी
टाके इतने की सिल नही पाओ गी
मेरी इस हालत पे भी मुंह मोड़ लिया
क्या प्थर हो गया है तुम्हारा दिल

ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा
मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है
बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है
बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ’ मैं ने किया
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है
रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र
मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना’त हो गई है